तुम न आए तो क्या सहर न हुई हाँ मगर चैन से बसर न हुई , मिर्ज़ा ग़ालिब

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता..

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई…

ये शायरी हैं उस महान शायर की जिसे हम मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से जानते हैं |आज मिर्ज़ा के शेर सहारा हैं सबका ,अपने दिल के दर्द को बयां करने का |मिर्ज़ा जब शायरी कर रहे थे तब उन्हे पता भी नहीं था की वो इतने मक़बूल होजाएगे |ग़ालिब का हर अलफ़ाज़ इंसान के दिलो दिमाग पर छा जाता हैं | इंसान खुद को करीब पाता हैं उनके हर शेर के|

उर्दू के महान शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर, 1797 को आगरा के काला महल में हुआ था | मिर्ज़ा ग़ालिब का असली नाम मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग खान था. महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म उस दौर में हुआ जब मुगल सत्ता कमजोर पड़ रही थी और मिर्ज़ा ग़ालिब का जीवन बहुत ही मुश्किल हालात में गुजर रहा था | मिर्ज़ा ग़ालिब ने ऐसी शायरी लिखी जो जिंदगी के सार को बयान करती है. वे एक प्रमुख उर्दू और फ़ारसी कवि थे |मुगल साम्राज्य मे उनका सम्मान दबीर-उल-मुल्क, नज्म-उद-दौला का था |अपने जीवनकाल के दौरान, पहले से ही घटते मुगल साम्राज्य को ब्रिटिश राज द्वारा विस्थापित और विस्थापित कर दिया गया था और अंत में 1857 के भारतीय विद्रोह की हार के बाद इसे हटा दिया गया था |

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मिर्ज़ा के दादा, मिर्ज़ा क़ोआन बेग, एक सेल्जूक़ तुर्क थे, जिन्होंने अहमद शाह के शासनकाल के दौरान समरकंद से भारत में प्रवास किया था। उन्होंने लाहौर, दिल्ली और जयपुर में काम किया, पहासू के उप-जिले से सम्मानित किया गया और अंत में आगरा, यूपी, भारत में आकर बस गए। उनके चार बेटे और तीन बेटियां थीं। मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग और मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग उनके दो बेटे थे।

मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग याने ग़ालिब के पिता ने इज्ज़त-उत-निसा बेगम से शादी की, जो एक कश्मीरी थी, मिर्ज़ा अब्दुल्ला बेग पहले लखनऊ के नवाब और फिर हैदराबाद के निज़ाम, डेक्कन से कार्यरत थे। 1803 में अलवर में एक लड़ाई में उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें राजगढ़ (अलवर, राजस्थान) में दफनाया गया। तब गालिब की उम्र मात्र 5 साल से थोड़ी कम थी। उसके बाद उनके चाचा मिर्ज़ा नसरुल्लाह बेग खान ने उनका पालन-पोषण किया, लेकिन 1806 में नसरुल्ला की भी मृत्यु हो गई।

तेरह साल की उम्र में, ग़ालिब ने नवाब इलाही बख्श (फिरोजपुर झिरका के नवाब का भाई) की बेटी उमराव बेगम से शादी की।वह जल्द ही अपने छोटे भाई मिर्जा यूसुफ के साथ दिल्ली चले आए ।अपनी शादी के बाद, वह दिल्ली में ही बस गए। अपने एक खत में उन्होंने अपने शादी को दूसरे कारावास के रूप में बया किया जो स्वयं जीवन था। यह विचार कि जीवन एक निरंतर दर्दनाक संघर्ष है जो केवल तभी समाप्त हो सकता है जब जीवन स्वयं समाप्त हो जाता है, ये दर्द उनकी शायरी मे छलकता हैं ।

उनका फ़ारसी दीवान उनकी उर्दू से कम से कम पाँच गुना लंबा है लेकिन उनकी ख्याति उर्दू में उनकी शायरी पर टिकी हुई है।आज ग़ालिब न केवल भारत और पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तानी प्रवासी भारतीयों के बीच भी लोकप्रिय हैं |

मिर्ज़ा ग़ालिब पर बॉलीवुड और टेलीविजन में ज्यादा काम तो नहीं हुआ है. लेकिन बॉलीवुड में सोहराब मोदी की फिल्म ‘मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)’ की एक यादगार फिल्म थी. टेलीविजन पर गुलजार का टीवी सीरियल ‘मिर्ज़ा ग़ालिब (1988)’ भी एक मील का पत्थर है. फिल्म में भारत भूषण ने लीड रोल निभाया ,तो टीवी पर नसीरूद्दीन शाह ने मिर्ज़ा ग़ालिब को छोटे परदे पर जिंदा किया. ग़ालिब का निधन 15 फरवरी, 1869 को हुआ था |

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है|

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक|

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