आज बहुत याद आई सिलापचि तुम,पुराने दौर की मिनी वाश बेसिन

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परवीन अर्शी नई दिल्ली

आज बहुत याद आई सिलापचि तुम ,आज खाना खाने के लिए जैसे ही बैठी back pain की वजह से हाथ धोने के लिए उठ नहीं पा रही थी ,तभी एक छोटे मर्तबान मे हाथ धोना पड़ा मुझे ,बुरा लगा क्योकि कहा जाता हैं की बर्तनो मे हाथ नहीं धोये जाते हैं | मजबूरी थी धो लिया, तभी बचपन की सिलापचि याद आगई अचानक| बस फिर क्या था सोचा लिख दू मैं ही कुछ, ताकि आज के बच्चो तक कुछ जानकारी पहुंच सके, सिलापचि के बारे मे और हमारी सभी की यादें ताज़ा होजाये |आज भी पुराने घरों मे मिल जाएगी सिलापचि ,लेकिन ना के बराबर, उन्ही घरों मे मिलेगी जो आज भी अपनी परम्पराओ को संजो कर रखे हुए हैं |

बात करे अगर प्राचीन भारत से लेकर आधुनिक भारत के कालक्रम में शिल्पकार को, बहुआयामी भूमिका का निर्वाह करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है इन्हे । शिल्पकार शिल्पवस्तुओं के निर्माता और विक्रेता के अलावा समाज में डिजाइनर, सर्जक, अन्वेषक और समस्याएं हल करने वाले व्यक्ति के रूप में भी कई भूमिकाएं निभाता है। अतः शिल्पकार केवल एक वस्तु निर्माता ही नहीं होता , बल्कि इसका सृजन एक विशेष कार्य के लिए, ग्राहक की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है।

ग्राहक अगर शिल्पकार से कह दे कि, वह एक ऐसा प्याला बनाये, जिसे वे आसानी से पकड़ सकें और उससे गर्म पेय पी सकें। इस संबंध में शिल्पकार याने कुम्हार कप के हैंडल को इस तरह से डिजाइन करेगा कि उसे आसानी से पकड़ा जा सके और कप को इस प्रकार का आकार देगा कि न तो वह बहुत भारी हो और न ही बहुत बड़ा।

विभिन्न वस्तु एवं उत्पाद का निर्माण शिल्पकार के लिए एक साधना हो जाती है। इसी तर्ज़ पर शिल्पकार ने सिलापचि के निर्माण मे भी अपना योगदान दिया है| सिलापचि याने मिनी वाश बेसिन जो की पुराने ज़माने मे मेहमान नवाज़ी का एक हिस्सा था ,घर आये मेहमानो को दस्तरख्वान पर बिठा कर उनके हाथ धुलना एक परंपरा का हिस्सा था हमारी, जिससे से हमे कोई उच्च नीच या कोई घृणा का भाव नहीं आता था ,बल्कि दूसरे को सम्मान देना कि एक परंपरा थी, लेकिन जैसे जैसे हम तरक्की कर रहे हैं, हमारी परम्पराएँ पीछे छूटती जा रही हैं |हम अब अपने स्वाभिमान पर ले लेते हैं और फिर शुरू होजाती हैं भेदभाव और ऊंचनीच,बराबरी की भावना |पहले बच्चों को चरण स्पर्श करना ,नमस्कार या सलाम करना ,और सबसे पहले पानी देने की परंपरा या रिवाज़ सिखाया जाता था | लेकिन आज कल हेलो, हाय और बाय की परंपरा रह गयी हैं बस |आखिर क्यों इतने आगये निकल गए हम की ,हमारे संस्कार रीती रिवाज़ और परम्पराएँ पीछे ही रह गयी कही गुम होकर |

आज सिलापचि सिर्फ शब्द और याद बन कर रह गयी हैं ,आज की पीढ़ी जानती भी नहीं होगी ये शब्द और इसका महत्त्व क्या हैं और नाही   हमारे बुज़ुर्गो के पास इतना वक़्त हैं की उन्हात बताये और नाही  बच्चो के पास इतना वक़्त हैं की वो अपनी तेहज़ीब  और परम्पराएँ को जान पाए |

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