आस्था,अंधविश्वास या फिर जिन्नो की रहस्यमयी दुनिया,क़िला फ़िरोज़ शाह कोटला .परवीन अर्शी

बीते दो सालों से लगातार इस क़िले की बारीकियां और चुनौतियों को झेल कर और एक स्टोरी को पूरा करना आसान नहीं था मेरे लिए| सवाल आस्था और अंध विश्वास का था,जब अपनी तालीम पर इल्म हावी हो जाये,तो सोचना पड़ता है कि क्या हक़ीक़त में जिन्नो की कोई दुनिया है या कोई ज़ेहनी खलल हैं | लोगो की बातों और सोहबत का असर समझ नहीं आ रहा था कुछ भी, लेकिन जब खुद देखा… महसूस किया तो भी भरोसा नहीं हुआ, क्या वाकई ऐसा हुआ है| ये सिर्फ मेरा अनुभव है, किसी भी अन्धविश्वास को बढ़ावा देना मेरा मकसद नहीं है,मानो तो खुदा है न मानों तो पत्थर,अपनी अपनी आस्थाअपनाअपना विश्वास है |

एक बार को तो डर लगा ही था कि कहीं कुछ गलत न हो जाये मेरे साथ ,लेकिन अपने आप पर विश्वास था कि जब तक तुम किसी को न सताओ,तब तक तुम्हें कोई नहीं सता सकता | हालाँकि बहुत से बहरुपिया लोग भी मिलते हैं यहाँ पर जो आपकी कमज़ोरी और मजबूरी का फ़ायदा भी उठाते हैं आस्था के नाम पर,ऐसे लोगो से सावधान रहने की भी ज़रूरत है |

जिन्नो की छायादार और रहस्यमयी दुनिया वो है, जिस स्थान पर विश्वास और आध्यात्मिकता तार्किक स्पष्टीकरण की सीमा को चुनौती देते हैं, एक स्थान जो उन लोगों के लिए अंतिम आश्रय है, जिन्होंने हार मान ली है| हर गुरुवार को किले में भारी भीड़ होती है। यह मान्यता कि जिन्न किले से नीचे उतरते हैं और लोगों के अनुरोध और इच्छाओं को स्वीकार करते हैं। कागज़ पर ढेर सारी मनोकामनाएँ, परिसर के भीतर की दीवारों पर देखी जा सकती हैं।

जहां फरियादी आते हैं और फिरोज शाह कोटला किले के जिन्नो को खत लिखते हैं, मस्जिद की दीवारों पर सिक्के चिपकाते हैं, जिन्नो को दूध, मिठाई, फल और यहां तक ​​कि गोश्त भी देते हैं, सभी ‘दुखी आत्माओं’ को खुश करने व अपनी मन्नत पूरी करने के लिए यह सब किया जाता है |गुरुवार को दो बजे के बाद से यहाँ लोगो का आना शुरू हो जाता हैं,फिर दौर शुरू होता हैं मन्नतो का, दुआओ का, आस्था का, विश्वास का, हालाँकि आस्था की वजह से क़िले को नुक्सान भी पहुंच रहा है जो तेल या दिए जलाये जाते हैं उनसे दीवारों पर कालिख रंगत पड़ रही हैं|खाने का सामान रखने से चूहो ने जगह जगह अपना घर बना रखा है जिसकी वजह से नींव तक खोखला होने का अंदेशा रहता है| यूँ तो साफ़ सफाई का ख्याल भी रखा जाता है |क्या है इतिहास फ़िरोज़शाह कोटला का जानते हैं |

दिल्ली का फ़िरोज़ शाह कोटला सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुगलक द्वारा बनाया गया एक किला था, जिसे फ़िरोज़ाबाद भी कहा जाता था।यह किला जिसके एक और यमुना नदी बहती थी, दिल्ली का 5 वाँ शहर था, जिसकी स्थापना सुल्तान फ़िरोज़शाह तुगलक ने 14 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में की थी, और जो आज प्रसिद्ध फ़िरोज़शाह कोटला क्रिकेट स्टेडियम के निकट स्थित है। विशाल फ़िरोज़शाह कोटला का किला अपने महल के कमरों, मस्जिदों, रहस्यों और ख़ासियतों के कई खंडहरों के साथ आने वाले लोगो को अपनी ओर आकर्षित करता है | यह 14 वीं शताब्दी ईस्वी की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है, एक विशाल अशोक-युग का पत्थर का स्तंभ, एक बावली है शहर की हलचल के बीच शांति है ओर चारों ओर भीड़ है।

दिल्ली के सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुगलक ने दिल्ली सल्तनत की नई राजधानी के रूप में 1354 में फ़िरोज़ाबाद के किले और शहर की स्थापना की, और इसमें वर्तमान फ़िरोज़ शाह कोटला का स्थान भी शामिल है। कोटला का शाब्दिक अर्थ है किला या गढ़| यहाँ पर अशोक स्तंभ के अलावा, किला परिसर में जामा मस्जिद (मस्जिद), एक बावली और एक बड़ा उद्यान परिसर भी है। अशोक स्तंभ , जिसे ओबिलिस्क या लाट भी कहा जाता है, एक अशोक स्तम्भ है, जिसका श्रेय मौर्य शासक अशोक को दिया जाता है। 13.1 मीटर ऊँचा स्तंभ, जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से पॉलिश किए गए बलुआ पत्थर और डेटिंग से बना था, फ़िरोज़ शाह के आदेश के तहत 14 वीं शताब्दी में अंबाला से लाया गया था।

महल के ढहते अवशेषों से उगता है अशोकस्तंभ, मौर्य सम्राट द्वारा छोड़े गए अशोक के कई स्तंभों में से एक; इसे हरियाणा सल्तनत के फिरोज शाह तुगलक के आदेशों के तहत, हरियाणा में यमुनानगर जिले के पौंग घाटी में टोपरा कलां से दिल्ली लाया गया और 1356 में इसके वर्तमान स्थान पर फिर से खड़ा कर दिया गया। ओबिलिस्क पर मूल शिलालेख मुख्य रूप से ब्राह्मी लिपि में है| लेकिन भाषा में कुछ पाली और संस्कृत बाद में जुड़ी गई थी । जेम्स प्रिंसेप द्वारा 1837 में शिलालेख का सफलतापूर्वक अनुवाद किया गया था।

फ़िरोज़ शाह कोटला के भीतर स्थित अशोक स्तंभ पूरी तरह से जामा मस्जिद के उत्तर की ओर स्थित है। हालांकि यह स्तंभ दुर्भाग्यवश एक विस्फोट के दौरान क्षतिग्रस्त होने के बाद पांच टुकड़ों में टूट गया था। 1838 तक यानी एक सदी तक स्तंभ की उपेक्षा की गई, जब 1857 के विद्रोह के बाद राजा हिंदू राव ने अशोक स्तंभ को कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी को तोड़ने के लिए कार्यभार संभाला तब एक साल के भीतर, संरचना को एक साथ रखा गया और फिर से स्थापित किया गया।

दोनों अशोक स्तंभ सूती रेशम से लिपटे हुए थे और कच्चे रेशम से बने ईख के बिस्तर पर रखे गए थे। इसलिए उन्हें 42 पहियों से जुड़ी एक विशाल गाड़ी पर लाया गया और यात्रा के दौरान किसी भी तरह की क्षति से बचने के लिए फिरोज शाह तुगलक ने 200 लोगों द्वारा उनको उनके मूल स्थानों से दिल्ली तक सावधानी पूर्वक लाया गया। दिल्ली पहुंचने पर, उन्हें फिर से उनके अंतिम ठिकाने पर, एक फ़िरोज़ शाह कोटला के भीतर और दूसरे को दिल्ली विश्वविद्यालय और बारा हिंदू राव अस्पताल के पास ले जाया गया।सल्तनत मीनार के लिए अशोक स्तंभ को तोड़ना और पुन: उपयोग करना चाहती थी। फ़िरोज़ शाह तुगलक ने हालांकि इसे मस्जिद के पास खड़ा करने का फैसला किया। दिल्ली में 1356 में ओबिलिस्क की फिर से स्थापना के समय, किसी को भी पत्थर में उत्कीर्ण लिपि का अर्थ नहीं पता था।

लगभग पांच सौ साल बाद, 1837 में स्क्रिप्ट (ब्राह्मी) को जेम्स प्रिंसेप ने दक्षिण एशिया के अन्य स्तंभों और गोलियों पर खोजी गई स्क्रिप्ट की मदद से हटा दिया था |गोलाकार बाओली, अशोकन स्तंभ के उत्तर पश्चिमी हिस्से की ओर है। यह भूमिगत अपार्टमेंट के रूप में निर्मित एक बड़े बगीचे और इसके पूर्वी किनारे पर बनी एक बड़ी भूमिगत नहर के बीच स्थित है, जहाँ से पानी कुएँ में जाता है। इस बावली ने रॉयल्टी के लिए एक ग्रीष्मकालीन रिट्रीट के रूप में कार्य किया, जहां उन्होंने इस कुएं के पानी में ठंडा होने और स्नान करने में समय बिताया। बाओली बंद और खंडहर है, लेकिन फिरोज शाह कोटला परिसर के भीतर बगीचों को पानी देने के लिए उपयोग किया जाता है।

बहुत से लोग बावली के इनसाइड को नहीं देख पाएंगे। हालाँकि आप पिरामिड स्मारक पर चढ़ सकते हैं जहाँ एक ऊंचे दृश्य के लिए अशोक स्तंभ स्थापित है। बाओली का स्पष्ट दृष्टिकोण अभी भी संभव नहीं है। क़िले के गार्ड बताते हैं कि 2014 की शुरुआत में आत्महत्या की घटना के बाद से बावली बंद है।शाम होते होते यहाँ से लोगो को बाहर कर दिया जाता है और क़िले के चारों ओर सुरक्षा के चाकचौबंद इंतज़ाम कर दिए जाते हैं |

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