असीरगढ़ का क़िला,जहा आज भीअश्वत्थामा रात के समय किले के चारों ओर घूमते हैं

बुरहानपुर शहर एक इतिहासिक शहर हैं , यही पर मुमताज़ महल को भी रखा गया था, ताजमहल यही बनने वाला था |यही जामा मस्जिद भी देखने लायक हैं |व्यापार की दृष्टि से यहाँ का मुख्य रोज़गार लूम और बीड़ी बनाना हैं काफी गरीबी हैं इस शहर मे, रोज़गार की कमी बहुत हैं |लेकिन इतिहास बहुत अमीर हैं महत्त्व पूर्ण हैं साफ़ सफाई क मामले मे ठीक ठाक ही हैं यही पर बस्ता हैं ऐतिहासिक क़िला असीरगढ़ का |

असीरगढ़ का क़िला बुरहानपुर जिला मुख्यालय से इंदौर इच्छापुर हाईवे पर 20 किलोमीटर दूर सतपुडा पर्वत शृंखला पर 750 मीटर ऊंचाई पर स्थित हैं |मध्य प्रदेश एक पर्यटक हॉटस्पॉट है यह दूसरा सबसे बड़ा भारतीय राज्य (क्षेत्र के अनुसार) मंदिरों और किलों के रूप में कुछ वास्तुशिल्प चमत्कारों का घर है। यह एक भारतीय किला है जो पूर्व मध्य प्रांत और वर्तमान मध्य प्रदेश में बुरहानपुर शहर के उत्तर में ताप्ती और नर्मदा के बीच स्थित है। यह प्राचीन किलों में से एक है जो सदियों से खड़ा है | 60 एकड़ भूमि के क्षेत्र में फैला, असीरगढ़ किला मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से लगभग 20 किमी दूर है।यह अब खंडहर में खड़ा है, लेकिन इतिहास है कि यह इसे पर्यटन सर्किट का एक केंद्र बिंदु बनाता है। इस किले की भव्यता और सुंदरता कभी उच्च सम्मान में थी, जो समय की कसौटी पर खरा नहीं उतर सका।

इस किले में अपने आप में सैकड़ों कहानी दफन हैं। इस किले की मुख्य बात यह है कि जिसने भी अपनी ताकत से इस किले को जीतना चाहा उसे मुंह की खानी पड़ी। इस कारण हजारों साल पहले बने इस किले को पूरे देश पर राज करने वाले शासक भी जीत नहीं पाए। जितने भी शासक रहे हैं इनमें से सब ने छल कपट से इस पर विजय पाई। आजादी के पहले तक इस पर अंग्रेजों का कब्जा रहा है और उसके पहले सबसे ज्यादा शासन काल मुगलों का रहा।

यह किला तीन भागों में बंटा हुआ हैं ऊपरी हिस्सा असीरगढ़, बीच का कमरगढ़ और निचला मलयगढ़ कहलाता है। कुछ लोग मानते हैं कि यह किला अश्वत्थामा की पूज्य स्थली है और कुछ इसे एक सूफी संत का स्थान बताते हैं।इतिहासकारों का कहना है कि इसे ‘आशा अहीरो नाम के व्यक्ति ने बनवाया था। इसके पास अनगिनत पशु थे।  जिन्हे शेर व अन्य जानवर खा रहे थे और कई राजाओं ने भी इससे इनके पशु जब्त कर लिए थे। इसके बाद भी इन पशुओं को गिनना मुश्किल था। लेकिन अंदाज लगाते हुए आशा असीर समझ जाता था कि पशु कम हो गए हैं।

इसकी सुरक्षा के लिए उसे ऐसे स्थान की जरूरत थी जहां से वह नजर रख सके और उनकी सुरक्षा हो सके। उनसे एक ऐसा स्थान चुना जहां पर पूरी सुरक्षा हो सकती थी, लेकिन वहां एक तेजस्वी सूफी संत रहा करते थे, जिनका नाम था हजरत नोमानन चिश्ती। उस समय लगभग आठवी शताब्दी रही होगी 60 एकड़ में फैला यह किला मे पांच तालाब, एक मंदिर एक मस्जिद शामिल है,और गंगा व जमुना नाम के दो कुंड भी हैं। इतनी ऊंचाई पर होने के बावजूद भी सालभर ये कुंड कैसे लबालब रहते हैं, यह बात आज तक कोई नहीं जान पाया की पानी कहा से आता हैं । कहा यह भी जाता है कि दुश्मन को मारकर इन कुंडों में डाल दिया जाता था।क़िले मे जाना हो तो आप सीढिय़ों से चढ़कर जा सकते हैं, यहां 1000 सीढिय़ां हैं।यहां पहुंचकर सूफी संत ने आशा अहीर ने मिन्नत की और अपने परिवार व पशुओं की सुरक्षा करने का निवदेन किया। संत मान गए और उसे यहां रहने की अनुमति दे दी। इसके बाद आशा अहीर पर छल से फिरोजशाह तुगलक के एक सिपाही मलिक ख़ां के पुत्र नसीर ख़ां फारूकी ने असीरगढ़ पर कब्जा किया। वहीं आदिलशाह फारूकी के मरने के बाद असीरगढ़ पर बहादुरशाह फारूखी ने कब्जा कर लिया।

 

अकबर भी चाहते थे किले पर कब्जा करना जब इस किले के बारे में धीरे-धीरे लोकप्रियता बढ़ी और अकबर को पता चला तो अकबर जिनका पूरे देश पर कब्जा था ,वे भी इस पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए बेताब हो उठे थे। उस समय बहादुरशाह फारूखी का कब्जा था। जब उसे पता चला कि अकबर इस किले पर कब्जा करना चाहते हैं और सेना भेज रहे हैं तो उसने इस किले की व्यवस्था इतनी दुरुस्त और शक्तिशाली तरीके से की कि किले में 10 साल तक खाने की वस्तुएं उपलब्ध हो सकतीं थीं।

ऐसे में अकबर को छह महीने तक इस किले के नीचे खड़ा रहना पड़ा था। सम्राट कहे जाने वाले अकबर ने असीरगढ़ पर आक्रमण तो किया लेकिन किले के सारे रास्ते बंद होने के कारण वे किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सके और हार मान गए। इसके बाद अकबर ने एक रणनीति तैयार की और बहादुरशाह को संदेश भेजकर यह विश्वास दिलाया कि वे आपस में बात करना चाहते हैं किसी पर कोई प्राणघातक हमला नहीं किया जाएगा। बात करने के लिए बहादुरशाह किले से बाहर आया। जब बातचीत चल रही थी तभी पीछे से आकर हमला कर दिया और जख्मी हालत में गिरफ्तार कर बंदी बना लिया और 17 जनवरी 1601 ई. को असीरगढ़ के किले पर अकबर को विजय प्राप्त हो गई व किले पर मुगल शासक का झंडा फहरा दिया गया। उसके बाद भी शासक आए लेकिन अंत में 1904 ई. में इस पर अंग्रेज़ी सेना ने निवास किया।

लोककथा है कि, अश्वत्थामा ने सभी पांचों पांडव पुत्रों को मार डाला और यहां तक ​​कि अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को भी मारने की कोशिश की, जबकि वह अपने पिता गुरु द्रोणाचार्य की मौत का बदला लेने के लिए अपनी मां के गर्भ में था। परिणामस्वरूप, भगवान कृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया और कहा कि वह अपने कंधे पर सभी लोगों के दुराचार का भार वहन करेगा, और वह बिना किसी स्नेह या सहानुभूति प्राप्त किए अकेले ही घूमता रहेगा।भगवान कृष्ण ने अपने माथे से मणि भी छीन ली।

कहा जाता है की यह शाप कलयुग के अंत तक जारी रहेगा । ऐसा माना जाता है कि जब कलयुग का अंत होगा, तो अश्वत्थामा भगवान विष्णु के दसवें अवतार होंगे और उस श्राप से मुक्ति पा लेंगे।अश्वत्थामा के होने के साक्ष्य भी प्रस्तुत किए के लोगो ने हैं। बताया जाता हैं की कि महाभारत काल के अश्वत्थामा अपने पिता गुरु द्रोण की हत्या का बदला लेने के लिए अब भी भटक रहे हैं। कई बार अश्वत्थामा गांव वालों को भी दिखाई दिए हैं।महाभारत काल लगभग 5000 वर्ष पहले का माना जाता है, इतने वर्षों बाद भी अश्वत्थामा का जिंदा रहना महाभारत की कहानी बयां करता है, जिसमें कृष्ण ने उन्हे अमरता का वरदान दिया था। गांव वालों का कहना है कि अश्वत्थामा किले में बने शिव मंदिर में रोज शिव की आराधना करने आता है।ग्रामीणों के अनुसार खेत व सतपुड़ा के जंगल में भी इनके बड़े-बड़े पांव देखे हैं।और हर रोज़ शिवलिंग पर फूल पाए जाते हैं सुबह सुबह |

कुछ लोग तो यह दावा भी करते हैं कि उन्होंने अश्वत्थामा को देखा है, लेकिन इस दावे पर में कितनी सच्चाई है, इस पर संदेह है।लोगों का यह भी मानना ​​है कि अश्वत्थामा रात के समय किले के चारों ओर घूमते हैं, और हल्दी और तेल के लिए लोगों को अपने खून बहने वाले माथे को ठीक करने के लिए रोकते हैं। आज तक, यह कहा जाता है कि कोई भी, जिसने उसे देखा है वह या तो अपनी मानसिक स्थिरता खो चुका है या पागल हो गया है।पहाड़ की चोटी पर बने किले में स्थित यह तालाब बुरहानपुर की तपती गरमी में भी कभी सूखता नहीं तालाब के थोड़ा आगे गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर है। मंदिर चारों तरफ से खाइयों से घिरा है।सबसे पहले अश्वत्थामा ही इस मंदिर में आकर करते हैं भगवान शिव की पूजा|खाइयों में से किसी एक में गुप्त रास्ता बना हुआ है, जो खांडव वन (खंडवा जिला) से होता हुआ सीधे इस मंदिर में निकलता है।इसी रास्ते से होते हुए अश्वत्थामा मंदिर के अंदर आते हैं

नीचे बने शिव मंदिर में मुसलिम करता है में पूजा ,असीरगढ़ किले के नीचे बने शिव मंदिर में मोहम्मद जहीर अल्लाह की पूजा तो करता ही है साथ में पास में बने शिव मंदिर में भी साफ-सफाई और पूजा की जिम्मेदारी निभाते हैं । इन्हे हिंन्दू और मुसलमान धर्म में कोई अंतर नजर नहीं आता। इनका यह मानना है कि जिस धर्म में इन्होंने जन्म लिया है उसे वे पूरी शिद्दत के साथ मानते हैं और जब बात आती है कि सब का मालिक एक तो शिव की पूजा और साफ-सफाई करने में इन्हे कोई परहेज नहीं होता हैं ।असीरगढ़ का किला भारत की चुनिंदा खास संरचनाओं में गिना जाता है। जो सतपुड़ा की पहाड़ियों पर स्थित है। समुद्र तल से इस किले की ऊंचाई लगभग 250 फुट की है। यह किला आज भी अपने वैभवशाली अतीत को बखूबी प्रदर्शित करता है।यह भारत के उन रहस्यमय किलों में गिना जाता है जिसका सटीक अतीत इतिहासकार नहीं लिख पाएं। जानकारों का मानें तो इस किले का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है।

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