अतिराष्ट्रवाद कुछ नहीं होता, देश के साथ होने की,अपने सैनिकों को समर्थन देने की कोई सीमा नही होती. डॉ आदेश त्यागी

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सोशल मीडिया पर बहुत से हैश टैग आरम्भ हो गए हैं जिनमे से say no to war और we want peace प्रमुख हैं। हॉट परसूट के दौरान PAF के F-16 एयरक्राफ्ट को 35 वर्ष पुराने MIG21 के पायलट ने मार गिराया। हमारा विमान भी तकनीकी ख़राबी के कारण POK में जा गिरा और विंग कमाण्डर अभिनंदन पाक आर्मी के द्वारा कैप्चर कर लिए गए। यह एक भारी झटका था सारे भारतीय जनमानस, सेना और सरकार के लिए (मैं परिवार की बात नहीं कर रहा हूँ जो कि एक पूर्व एयर मार्शल का भी परिवार है)।

इसी का दूसरा पहलू यह रहा कि भारत सरकार की कूटनीति या यूँ कहिये कि मोदी जी ने जो 5 वर्ष निरन्तर अथक विदेश यात्राएँ की थीं उनके कारण पाकिस्तान पर भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव था कि भारतीय पायलट को जेनेवा कन्वेंशन के तहत भारत को वापिस सौंपा जाए। ऊपर से प्रधानमंत्री और तीनों सेनाओं ने संयुक्त रूप से कहा भी कि यदि हमारे पायलट को खरोंच भी आई तो पाकिस्तान को भीषण ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।

 

इससे पहले पाकिस्तान ने भभकियाँ तो सुनी थीं, धमकियाँ पहली बार सुन रहा था। आर-पार का संदेश दिया जा चुका था और सही जगह पहुँच भी गया था। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अपनी संसद में कहना पड़ा कि वह कल यानी 1 मार्च को peace gesture के रूप में भारतीय पायलट को भारत को सौंप देगा। जेनेवा कन्वेंशन के अनुसार पायलट को सुरक्षित भारत वापस लाया जाएगा।

हमारे सैन्य अधिकारी के कैप्टिव होने के बाद से एक तरफ़ ऐसे लोग हैं, और बहुत हैं जो इस स्थिति में एक बेहतर रुख़ लेकर, सकारात्मक रवैये के साथ यह कह रहे हैं कि हमें अपनी सेना के साथ, अपने देश के साथ खड़े रहने की ज़रूरत है। और दूसरी तरफ एक गिरोह है, जिसके होने से हमें लगता है कि हमें पाकिस्तान के F-16 की ज़रूरत नहीं है, उससे ज़्यादा घाव तो यही लोग कर जाते हैं।

कुछ  लोग सैनिकों के बलिदान से जाति निकाल लेते हैं,  कुछ लोग सैनिकों के साथ खड़े होने वाले देशभक्त लोगों को हिन्दुओं के सवर्ण और मेट्रो शहरों के होने का दावा कर लेते हैं, ये लोग ऐसे धक्कों पर देश के साथ खड़े न होकर पाकिस्तान की मदद करते दिखते हैं जब वो पूछते हैं कि क्या सबूत है कि हमने 300 आतंकी मार गिराए।

देशभक्त होना कोई गाली नहीं है, या अतिराष्ट्रवाद भी बुरा नहीं है क्योंकि इन सबका उद्देश्य राष्ट्र की बेहतरी और वैश्विक छवि को सुदृढ़ करने का होता है। राष्ट्रवाद को विष बताने वालों से पूछना चाहता हूँ कि राष्ट्रवाद विष कैसे हो सकता है? जो लोग मोमबत्तियाँ लेकर सड़कों पर श्रद्धांजलि देते हैं, उनके लिए देश बहुत मायने रखता है भले ही उनके घरों के पास की नाली साफ न की गई हो, भले ही सड़कें टूटी हुई हों या कई दिन से नलों में पानी न आया हो।

यह सब इसलिए होता है क्योंकि हम चाहे जिस भी सरकार में, जिस भी स्थिति में हों, हम केवल और केवल देश को अपना देश मानते हैं। इसलिए ऐसे मौक़ों पर कोई भीख माँगकर जीवन यापन करती बुज़ुर्ग महिला अपनी पूरी पूँजी पुलवामा के बलिदानियों के परिवारों के नाम कर देती है। इसीलिए, ऐसे मौक़ों पर लोग आगे बढ़कर हर संभव मदद करते दिखते हैं।

यहाँ लोग, सरकार ने क्या विकास किया, उनके जीवन में क्या बदलाव लाए, इससे ऊपर उठ जाते हैं क्योंकि देशभक्ति निर्धन से निर्धन स्थिति में, अपनी पहचान के लिए लड़ते देश के लोगों में भी होती है। उसके लिए अमेरिका या यूरोप जैसी चमचमाती इमारतों की ज़रूरत नहीं होती। देशभक्ति देश के लिए होती है और इसमें ‘नागरिक’ और ‘देश’ केवल दो शब्द भर ही काफ़ी होते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य सारी बातें गौण हो जाती हैं क्योंकि हमारा और हमारे देश का अस्तित्व एक दूसरे पर आश्रित हैं।

इसलिए, ऐसी परिस्थितियों में हम एक हो जाते हैं। सारी पार्टियाँ एक हो जाती हैं। हम सड़कों पर एक साथ उतरते हैं, और एक साथ नारे लगाते हैं। हम किसी को नारे लगाता देखते हैं, तो उनके साथ हो जाते हैं, उस प्रदर्शन में शामिल हो जाते हैं। इसके लिए कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होती। क्यों? क्योंकि देशप्रेम उसी तरह से विकसित होता है जैसे अपनी माँ से प्रेम करना। उसके लिए हम पूरे जीवन भर तैयार होते हैं, चाहे वो खेलों से हो, युद्धों की कहानियों से हो, हमारे इतिहास से हो, या इस बात से कि हम कहाँ थे, कैसे बर्बाद किए गए और आज कहाँ पहुँचे हैं। यह एक प्राकृतिक एवम् स्वाभाविक प्रतिक्रिया है ऐसे समय पर।

लेकिन कुछ लोगों के लिए ये एक सहज बात नहीं होती। उन्होंने बार-बार दिखाया है कि उनकी ज़मीन कहीं और है। उनके लिए सैनिकों पर पत्थर फेंकने वालों के लिए, जवानों के घेरकर मार देने वाले नक्सलियों के लिए, देश को तोड़ने वाली शक्तियों के लिए हमेशा मानवाधिकार जैसे शाब्दिक हथियार होते हैं। लेकिन जब सैनिक का बलिदान होता है तो तर्क घास चरने चला जाता है, और जब आता है तो कहा जाता है कि ये तो उनका काम है!

कुछ लोग अयेसे भी हैं जिंहोने लगातार लिखा कि वायु सेना द्वारा एयर स्ट्राइक की जड़ में भारतीय देशभक्तों का उन्माद है जिसके कारण सरकार ने ऐसी आज्ञा दी। साथ ही, उन्होंने पुलवामा हमलों के समय भी सरकार को घेरा था। इनकी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती, क्योंकि इन्हें न तो सेना से मतलब है, न सैनिक से, न देश से, न समाज से।

इन्हें मतलब केवल और केवल नैरेटिव से है जो कि किसी भी तरह से, कैसे भी उन लोगों के विरुद्ध विष वमन कर सकें जो सही मायनों में देश के साथ खड़े हैं। गिरोह का सदस्य इसे चुनावों से जोड़ता है, और इसकी टाइमिंग पर सवाल उठाता है क्योंकि यही इनका
एजेंडा है।

ऐसे लोगों को पहचानिए, और इनके एजेंडाबाजी पर, फ़र्ज़ी आँसू पर, इनकी निम्न स्तर के ट्वीट्स पर सवाल कीजिए कि इतना गिरने की क्या ज़रूरत है? इनसे पूछिए कि कहाँ से लाते हैं ऐसा ज़हर जो उसी देश के विरुद्ध इस्तेमाल होता है जिन्होंने उन्हें इतना बोलने की आज़ादी दे दी है कि वो देश के अस्तित्व को ही मिटाने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं।

इन तथाकथित बुद्धिजीवियों और लिबरल्स का यह एक रोग है, ये मानसिक रूप से बीमार, हैं। ये संवेदनशील नहीं हैं, ये देशविरोधी ताक़तों के एजेंट हैं जो क्षति होने पर सरकार को घेरते हैं, और बदला लेने पर सरकार को समीकरण से हटाकर सैनिकों की जय-जयकार बोलते हैं। फिर, यदि इस कार्य में क्षति हो तो दोबारा सरकार को, देशभक्त लोगों को कोसने लगते हैं। ये वही लोग हैं जो पहले सर्जिकल स्ट्राइक पर भी सबूत माँग रहे थे और अब के एयर स्ट्राइक पर भी सबूत माँग रहे हैं। कुछ और न मिला तो नो वार का हैश टैग चलाने पर आ चुके हैं।

बदलते समीकरण पर भी इनके विचार नहीं बदलते। विचार बदलने का सीधा-सा अर्थ है कि इनके शब्दों में धूर्तता है। इसका मतलब है कि इनकी संवेदनशीलता की जड़ में संवेदनहीनता है जो शब्दों के खेल से बस छुप गई है।मित्रो, अतिराष्ट्रवाद कुछ नहीं होता। देश के साथ होने की, अपने सैनिकों को समर्थन देने की कोई सीमा नहीं होती। देश ने हमें जीवन की गारण्टी दी और सेना ने उस गारण्टी के प्रोटेक्शन की गारण्टी दी है।

 

1 thought on “अतिराष्ट्रवाद कुछ नहीं होता, देश के साथ होने की,अपने सैनिकों को समर्थन देने की कोई सीमा नही होती. डॉ आदेश त्यागी

  1. शगुफ़्ता टाइम्स के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ

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