भारत और अमेरिकी घनिष्टता

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

अमेरिकी विदेश मंत्री माइकेल पोम्पिओ की यह संक्षिप्त भारत-यात्रा काफी सफल कही जा सकती है। वैसे तो वे पहले भी कई बार सपत्नीक भारत आ चुके हैं लेकिन विदेश मंत्री के तौर पर वे पहली बार भारत आए हैं। उनकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य ओसाका में होनेवाले जी-20 सम्मेलन के लिए अग्रिम तैयारी करना था। ऐसा लग रहा था कि इस मौके पर उनकी यात्रा के दौरान कई बदमजगियां हो सकती थीं। जैसे कि ईरानी तेल, एस-400 रुसी मिसाइल, भारत-अमेरिका व्यापार आदि मसले पिछले कुछ दिनों से दोनों देशों के बीच कहा-सुनी को जन्म दे रहे थे। लेकिन संतोष का विषय है कि पोम्पिओ और हमारे विदेश मंत्री डाॅ. जयशंकर ने कोई ऐसी बात नहीं कही, जिससे दोनों देशों के बीच किसी प्रकार की कड़ुवाहट पैदा हुई है बल्कि पोम्पिओ ने तो खुले में ऐसी बात कह दी, जो आज तक किसी अमेरिकी नेता ने कहने का साहस नहीं किया।

उन्होंने कह दिया कि अमेरिका ने अपनी पाकिस्तान-नीति को एक दम उलट दिया है। पिछली अमेरिकी सरकारों की पाकिस्तान-नीति को शीर्षासन कराते हुए उनकी सरकार ने पाकिस्तान को यह बता दिया है कि वह आतंकवाद को किसी भी रुप में बर्दाश्त नहीं करेगी। भारत को और क्या चाहिए ? इसी मुद्दे को लेकर नरेंद्र मोदी ओसाका जा रहे हैं। जी-20 सम्मेलन में भी यही मुद्दा छाया रहनेवाला है। इसके अलावा ईरान पर लगे प्रतिबंधों के कारण अब भारत को तेल की आपूर्ति करने में भी सक्रिय अमेरिकी मदद का आश्वासन मिला है। पारस्परिक व्यापार में पैदा हुई गठानों को खोलने के लिए ले-दे की रणनीति की तरफ भी पोंपियो ने इशारा किया है।

जहां तक रुस से एस-400 मिसाइलों की खरीद को रद्द करने का अमेरिकी दबाव है, जयशंकर ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अपने राष्ट्रहितों की अनदेखी नहीं कर सकता। भारत और अमेरिका, दोनों देशों की इस समय साझी चिंता है- चीन ! चीन और अमेरिका के बीच इस समय भयंकर व्यापारिक मुठभेड़ चल रही है। इसके अलावा चीन के दोस्तों से अमेरिका इन दिनों दूरी बना रहा है, जैसे पाकिस्तान से और अमेरिका के दोस्तों से चीन की प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, जैसे भारत, जापान, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड आदि से। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच घनिष्टता बढ़ना स्वाभाविक है। फिर भी भारत को सावधान रहना होगा, क्योंकि ट्रंप का अमेरिका अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कुछ भी कर सकता है।

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