भूत आया ,भूत आया लेकिन देखा किसी ने नहीं आज तक, भानगढ़ का भूत

National

बचपन से हम सुनते आ रहे हैं की भूत आया ,भूत आया, लेकिन देखा किसी ने नहीं आज तक| शायद ये हमारी माँ की एक कोशिश होगी अपने बच्चो की हिफाज़त करने कि, की अगर वो डराएगी नहीं तो बच्चे शांति से नहीं बैठेगे या फिर उनकी माँ की भी यही कोशिश रही होगी उनके लिए|वजह जो भी हो लेकिन भूत का अस्तित्व आज भी मौजूद हैं कहानियों और किस्सों मे |

वैसे तो हमारे देश में बहुत सी कई रहस्यमय जगहे है, लेकिन इस लिस्ट में जो नाम सबसे ऊपर आता वो है भानगढ़ का किला जो कि “भूतो का भानगढ़” नाम से ज्यादा प्रसिद्ध है।भानगढ़ कि कहानी बड़ी ही अजीब है के कहानिया इस क़िले से जुडी हैं, किंवदंती के अनुसार, बाबा बालक नाथ नामक एक साधु किले के इलाके में रहते थे, और यह उनका फरमान था कि किले के पूर्ववर्ती इलाकों में निर्मित कोई भी घर उनके घर से लंबा नहीं होना चाहिए, और अगर किसी भी घर की छाया उसके घर पर गिर गई तो उस घर, या किले और शहर का विनाश होगा।

16 वि शताब्दी में भानगढ़ बसता है और करीब 300 सालो तक भानगढ़ खूब फलता फूलता है। फिर अचानक वक़्त का कला साया यहाँ कि एक सुन्दर राजकुमारी पर हावी हो जाता हैं |कई साल पहले काले जादू में महारथ एक तांत्रिक सिंधु सेवड़ा राजकुमारी पर फ़िदा हो जाता है। वो राजकुमारी को वश में करने लिए काला जादू करता है पर खुद ही उसका शिकार हो कर मर जाता है|लेकिन मरने से पहले भानगढ़ को बर्बादी का श्राप दे जाता है और संयोग से उसके एक महीने बाद ही पड़ौसी राज्य अजबगढ़ से लड़ाई में राजकुमारी सहित सारे भानगढ़ वासी मारे जाते है और भानगढ़ वीरान हो जाता है।

तब से वीरान हुआ भानगढ आज भी वीरान है और कहते है कि उस लड़ाई में मारे गए लोगो के भूत आज भी रात को भानगढ़ के किले में भटकते है।क्योकि तांत्रिक के श्राप के कारण उन सबकि आत्मा को मुक्ति नहीं मिल पाई थी।भानगढ़ का किला, राजस्थान के अलवर जिले में स्तिथ है। इस किले से कुछ ही किलोमीटर कि दूरी पर विशव प्रसिद्ध सरिस्का राष्ट्रीय उधान है। भानगढ़ तीन तरफ़ पहाड़ियों से सुरक्षित है। सुरक्षा के लिहाज़ से इसे कई भागों में बांटा गया है।इस किले में कई मंदिर भी है जिसमे भगवान सोमेश्वर, गोपीनाथ, मंगला देवी और केशव राय के मंदिर प्रमुख मंदिर हैं।इन मंदिरो कि एक यह विशेषता है कि जहाँ किले सहित पूरा भानगढ़ खंडहर में तब्दील हो चूका है वही भानगढ़ के सारे के सारे मंदिर सही है |लेकिन ज़्यादातर मंदिरो से मुर्तिया गायब है। सोमेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग मौजूद है।

इन मंदिरों की दीवारों और खम्भों पर की गई नक़्क़ाशी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह समूचा क़िला कितना ख़ूबसूरत और भव्य रहा होगा। सोमेश्वर मंदिर के बगल में एक बावड़ी है जिसमें अब भी आसपास के गांवों के लोग नहाया करते हैं ।भानगढ़ क़िले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भानगढ़ के बसने के बाद लगभग 300 वर्षों तक यह आबाद रहा। मुग़ल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल और भगवंत दास के छोटे बेटे व अम्बर(आमेर ) के महान मुगल सेनापति, मानसिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने बाद में (1613) इसे अपनी रिहाइश बना लिया था ।

माधौसिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा। विक्रम संवत 1722 में इसी वंश के हरिसिंह ने गद्दी संभाली।इसके साथ ही भानगढ की चमक कम होने लगी। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने समीप ही अजबगढ़ बनवाया और वहीं रहने लगा। वह समय औरंगजेब के शासन का था। औरंगजेब कट्टर पंथी मुसलमान था। उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दोनों बेटे मुसलमान हो गए, जिन्हें मोहम्मद कुलीज एवं मोहम्मद दहलीज के नाम से जाना जाता हैं|

इन दोनों भाईयों के मुसलमान बनने एवं औरंगजेब की शासन पर पकड़ ढीली होने पर जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन्हे मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया था, तथा माधो सिंह के वंशजों को गद्दी दे दी।कहते है कि भानगढ़ कि राजकुमारी रत्नावती बेहद खूबसूरत थी। उस समय उनके रूप की चर्चा पूरे राज्य में थी और देश के कोने कोने से राजकुमार उनसे विवाह करने के इच्छु‍क थे। उस समय उनकी उम्र महज 18 वर्ष ही थी और उनका यौवन, उनके रूप में और निखार आ चुका था। उस समय कई राज्योi से उनके लिए विवाह के प्रस्ताव आ रहे थे। उसी दौरान वो एक बार किले से अपनी सखियों के साथ बाजार में निकली थीं। राजकुमारी रत्नावती एक इत्र की दुकान पर पहुंची और वो इत्रों को हाथों में लेकर उसकी खुशबू ले रही थी। उसी समय उस दुकान से कुछ ही दूरी सिंधु सेवड़ा नाम का व्यक्ति खड़ा होकर उन्हे देख रहा था।

सिंधु सेवड़ा उसी राज्य में रहता था और वो काले जादू का महारथी था। ऐसा बताया जाता है कि वो राजकुमारी के रूप का दिवाना था और उनसे बहुत प्रेम करता था। वो किसी भी तरह राजकुमारी को हासिल करना चाहता था। इसलिए उसने उस दुकान के पास आकर एक इत्र के बोतल जिसे रानी पसंद कर रही थी उसने उस बोतल पर काला जादू कर दिया, जो राजकुमारी के वशीकरण के लिए किया था। लेकिन एक विश्वशनीय व्यक्ति ने राजकुमारी को इस राज़ के बारे में बता दिया था ।

राजकुमारी रत्नावती ने उस इत्र के बोतल को उठाया, लेकिन उसे वही पास के एक पत्थर पर पटक दिया पत्थlर पर पटकते ही वो बोतल टूट गयी और सारा इत्र उस पत्‍थर पर बिखर गया। इसके बाद से ही वो पत्थर फिसलते हुए उस तांत्रिक सिंधु सेवड़ा के पीछे गिर पड़ा और तांत्रिक को कुचल दिया, जिससे उसकी मौत हो गयी। मरने से पहले उस तांत्रिक ने श्राप दिया था कि इस किले में रहने वालें सभी लोग जल्दी ही मर जायेंगे और वो दो बारा जन्म नहीं ले सकेंगे और हमेशा उनकी आत्मांएं इस किले में भटकती रहेंगी।उस तांत्रिक के मौत के कुछ दिनों के बाद ही भानगढ़ और अजबगढ़ के बीच युद्ध हुआ जिसमें किले में रहने वाले सारे लोग मारे गये। यहां तक की राजकुमारी रत्नावती भी उस श्राप से नहीं बच सकी और उनकी भी मौत हो गयी। एक ही किले में एक साथ इतने बड़े कत्लेउआम के बाद वहां मौत की चींखें सुनाई देती हैं और मान्यता हैं कि आज भी उस किले में उनकी रू‍हें घुमती हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा खुदाई से इस बात के पर्याप्त सबूत भी मिले हैं कि यह शहर एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है। फिलहाल इस किले की देख रेख भारत सरकार द्वारा की जाती है। किले के चारों तरफ आर्कियोंलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) की टीम मौजूद रहती हैं। एएसआई ने सख्त हिदायत दे रखी है कि सूर्यास्ता के बाद इस इलाके में किसी भी व्यतक्ति के रूकने के लिए मनाही है।गौर करने वाली बात ये है की जहाँ एक ओर पुरात्तव विभाग ने हर संरक्षित क्षेत्र में अपने ऑफिस बनवाये है |वहीँ इस किले के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने अपना ऑफिस भानगढ़ से दूर बनाया है।

भानगढ़ मे भूत है कि नहीं यह एक अपनी मान्यता का विषय हो सकता है, लेकिन भानगढ़ एक बार घूमने लायक जगह है| भानगढ़ घूमने जुलाई -अगस्त में जाया जा सकता हैं क्योकि भानगढ़ तीनो तरफ से अरावली कि पहाड़ियो से घिरा हुआ है और सावन में उन पहाड़ियो में बहार आ जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, किले की वर्तमान स्थिति जादूगर के अभिशाप का परिणाम है, जादूगर और राजकुमारी के भूत किले मे लोगो को परेशान करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *