दिल तो सभी के एक ही हैं, बस उन पर हूकूमत का पहरा और सरहदों की बंदिशे हैं

 

हुसैनीवाला बॉर्डर से परवीन अर्शी की रिपोर्ट

हुसैनीवाला बॉर्डर, फिरोजपुर के मुख्य शहर से लगभग 10 किमी उत्तर पश्चिम में बसा एक गाँव हैं | चारों ओर लहलहाते खेतों से घिरा , क्यारियां से झांकते खिले ,अधखिलै फसलों के फूल देखकर लगता हैं, की मानो ये कुछ कह रहे हो हमसे, की सरहदे आसमानो की ,हवाओं की , बादलों की, और क़ुदरत की नहीं होती हैं | सरहदे इंसान खुद बनाता हैं, कुदरत नहीं बॉंटती कभी भी खुद को सरहदों मे | दिल्ली से शुरू हुआ सफर भटिंडा के पड़ाव पर आकर रुका और फिर भटिंडा से पलायन हुआ हुसैनीवाला बॉर्डर की ओर |भटिंडा से हुसैनीवाला बॉर्डर की दूरी चाँद घंटो के फासले पर हैं, यूं तो कई साधन हैं वहां तक पहुंचने के लेकिन अगर खुद की गाड़ी से जाया जाए तो बेहतर हैं | रास्ते भर मे किन्नू के शरबत की ठेला नुमा दुकाने मिलेगी |जो की आपको गर्मी से राहत देगी |

हुसैनीवाला बॉर्डर सतलज नदी के किनारे पर है, मेरी यात्रा के दौरान सबसे अविस्मरणीय क्षणो में से एक क्षण सतलुज के पुल के पास आ रहा था ,जो की पाकिस्तान से कुछ सौ मीटर दूर था और सूरज, एक नारंगी गेंद की तरह अपने आसमान पर साथ साथ चल रहा था , हर गुजरते पल को कम करते हुए, हमारे दाहिने ओर भारत के साथ बहने वाली सतलुज नदी का उग्र जल बह रहा है।

बहुत ही अलग अनुभूति देता हैं ये नज़ारा जैसे ही हम पुल पर चढ़े, हमें सतलुज नदी के पाकिस्तानी हिस्से का नजारा मिला और साथ ही पीले पीले रंग की टिन की चादरों द्वारा अवरुद्ध भी देखने को मिला दूसरे शब्दों में कहा जाए तो हम पकिस्तान की और बहने वाली नदी का नज़ारा नहीं देख सकते थे , हम जानते थे कि सतलज नदी भी भारतीय पक्ष की तरह ही दिखती होगी , लेकिन केवल यह अनुमान लगाने के लिए ही बचा था कि यह पुल के दूसरी तरफ का नज़ारा कैसा दिख रहा होगा, क्योंकि इसने सीमा पार अपना रास्ता बना लिया था।

कहते हैं, 1931, जब पूरा क्षेत्र सिर्फ पंजाब था, ब्रिटिश में एक समृद्ध प्रांत भारत ,

इसकी राजधानी लाहौर थी – जो उस समय का सबसे प्रगतिशील भारतीय शहर था।1931 में, 23 मार्च की शाम को, तीन युवा क्रांतिकारियों – भगत सिंह, सुखदेव और राज गुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई, और जेल अधिकारियों ने एक विद्रोह की आशंका के साथ, गुप्त रूप से उनके शवों को लाहौर से हुसैनीवाला पहुँचाया, और सतलज के तट पर उनका अंतिम संस्कार किया।मैं उस जगह खड़ी थी जहाँ उनका अंतिम संस्कार किया गया था, जिसे एक स्मारक द्वारा चिह्नित किया गया था |

वहां पर खड़े होते ही इतिहास के पढ़े हुए पन्ने सामने आजाते हैं और तब लगता हैं की ये आज़ादी कितनी क़ुर्बानियों के बाद मिली हैं हम सबको | नदी ने भी अपना रुख बदल दिया है, और दक्षिण में स्थानांतरित कर दिया है, जो अपने किनारों और स्मारक के बीच उपजाऊ भूमि के एक विशाल पथ को पीछे छोड़ देता है। स्मारक पार्क में समय-समय पर भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ दिखाई गई वीरता को सलाम करते हुए कई सजीले टुकड़े मौजूद हैं|

हुसैनीवाला ने दोनों देशों के बीच सीमा पार करने का काम किया। पुल के खंभे अभी भी खड़े हैं, इसलिए झुलसे हुए सिर के निशान हैं।१९७१ में पाकिस्तान की ओर से हुसैनीवाला में हेडवर्क्स के टावर गिरे थे । हुसैनीवाला अपने आप में एक विडंबना का स्मारक है भगत सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेजों से लड़ते हुए यही शहीद हो गए थे |

हुसैनीवाला का नाम एक मुस्लिम हुसैनी बाबा के नाम पर रखा गया है, जिसका मंदिर स्मारक पार्क के करीब है, धर्मस्थल के बाहर एक साइनबोर्ड ने कहा कि हुसैनी बाबा को अक्सर रातों में देखा जाता है, सफेद रंग के लिबास पहने हुए ये कहानियाँ बयां की जाती हैं वहां के लोगो द्वारा | मान्यता यह भी है कि जो लोग शुक्रवार को यहाँ पर दुआ करते हैं, उनकी इच्छाएं पूरी होती हैं |मंदिर की उम्र को बताने वाले अंकों पर पेंट फीका पड़ गया हैं , और दरगाह की उम्र भी लगभग 150 साल बताई जाती हैं ।

हुसैनीवाला मे दोनों देशों के लोग संयुक्त रूप से झंडा-पताका फहराने के लिए हर शाम इकट्ठा होते हैं।हुसैनीवाला मे भी वाघा बॉर्डर के समान ही रिट्रीट परेड होती हैं हर शाम | काफी सख्त चेकिंग के बाद अंदर प्रवेश दिया जाता हैं | अंदर घुसते ही दूर से ही पडोसी देश की सरहद दिखाई देती हैं |जैसे ही अंदर जाते हैं रिट्रीट परेड के लिए सामने सिर्फ चाँद कदमो के फासले पर ही पडोसी मुल्क के लोग बैठे दिखाई देते हैं हाथों मे अपने अपने मुल्क का झंडा लिए दोनों ही देशो के लोग अपने अपने सैनिको का उत्साह बढ़ाते हैं |

वन्दे मातरम् और भारत माता की जय सुनते ही सीना गर्व से चौड़ा होजाता हैं ,एक दूसरे को सम्मान सहित ललकारते जवान अपना बल दिखाते हैं |और दोनों ही ओर बैठे लोग अपने अपने जवानो को अनगिनत तालियों के साथ उनका होसला बढ़ाते और उनके जज़्बे को सलाम करते हैं | कहा हैं फर्क ? ढूंढ़ने से भी नहीं मिलता, लेकिन राजनीती की राजनीती समझ, आजाती हैं, की महज़ एक कुर्सी के लिए दो दिलो को, दो मज़हब के लोगो को, एक होते हुए भी दो हिस्सों मे बॉंट दिया गया |

परेड के खत्म होते ही जगह को तुरंत खाली करा दिया जाता हैं| सभी आए हुए लोग अपने अपने मुल्क के जवानो के साथ फोटो खिचवाते हैं एक यादगार की तौर पर, और लोग अपनी अपनी सरहदों मे लौट आते हैं लेकिन न सूरज अपना तेज अपनी सरहद मे रखता हैं, ना ही दोनों तरफ बहने वाली सतलुज नदी अपनी हद मे रहती हैं, वो तो लगातार दोनों ही मुल्कों के लोगो की प्यास बुझा रही हैं |पक्षी भी उड़ान भर रहे हैं दोनों ही ओर बिना किसी वीज़ा और पासपोर्ट के , कई सवालो को साथ लेकर आई हूँ ,जिनका जवाब मिलना मुश्किल हैं |

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