न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता

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परवीन अर्शी, नई दिल्ली

चौसठ खंबा  ,नई दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन बस्ती के 14 वीं सदी के बाजार क्षेत्र में स्थित है।भारत में सूफी मुस्लिम मकबरों के निजामुद्दीन इलाके में स्थित है। चौंसठ खम्बा 1623–24 के दौरान बनाया गया एक मकबरा है। चौसठ खंबा का अर्थ उर्दू और हिंदी में “64 स्तंभ” है|

सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (1236 ई। – 1325 ई।)की दरगाह पास ही है। जब मुगल सम्राट जहाँगीर ने दिल्ली पर शासन किया था। तब इसे अतागा खान के पुत्र मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका ने खुद के लिए एक मकबरा के रूप में बनवाया था, मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका ने गुजरात में मरने से पहले कई बार जहाँगीर की गुजरात के राज्यपाल के रूप में सेवा की थी।

चौसठ खंबा स्मारक को शुरू में मुगल काल के एक अभिनव उदार वास्तुशिल्प शैली में एक हॉल के रूप में बनाया गया था। इसे बाद में मकबरे में तब्दील कर दिया गया था । यह एक वर्ग संरचना है ,जो पूरी तरह से सफेद संगमरमर से बना हुआ है। संरचना में 64 स्तंभ हैं , जो पच्चीस भागो मे बटा हैं। प्रत्येक भाग एक गुंबद का सपोर्ट करती है। गुंबद बाहरी रूप से दिखाई नहीं देते हैं क्योंकि वे रिवर्स डोम हैं। छत सपाट है।हर एक दीवार में पाँच मेहराब हैं जो चौकोर पायो द्वारा रखे जाते हैं। प्रत्येक पाँच पायो के बीच, संगमरमर के ट्रेलेज्ड स्क्रीन हैं।

चौसठ खम्बा के पास ही हैं अतागा खान का मकबरा ,शिलालेखों के अनुसार, संरचना में मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका (जिसे कोटालताश भी कहा जाता है) की कब्र है। उनके पिता, अकबर के प्रधान मंत्री अतागा खान की कब्र भी आसपास के क्षेत्र में है। इसके अलावा, इस स्मारक के अंदर कई अन्य कब्रें हैं। यह अताग खान का पारिवारिक मकबरा माना जाता है। इसमें एक प्रवेश द्वार है।

ग़ालिब का मक़बरा इस मकबरे के उत्तरी ओर स्थित है। इस की तुलना गुजरात के सरखेज में संगमरमर से बने एक मकबरे से की जाती है, जहाँ मिर्ज़ा अज़ीज़ कोका ने कई बार जहाँगीर की गुजरात के राज्यपाल के रूप में सेवा की। सरखेज में ग़ालिब की मृत्यु हो गई थी और उन्हें अस्थायी रूप से वहीं दफना दिया गया था | फिर  उनके अवशेष को  बाद में चौसठ खंबा में स्थानांतरित कर दिए गए।

यह  स्मारक निजामुद्दीन धार्मिक परिसर का हिस्सा है और इसे एक विरासत भवन घोषित किया गया है। चौंसठ खंबा के फोरकोर्ट को  आगा खान ट्रस्ट द्वारा लैंडस्केप किया गया था। मार्च 2010 में  जश्न-ए-ख़ुसरू का सफल यहां आयोजित किया गया था। , जिसमें सूफ़ी कव्वाली संगीत में भारत और पाकिस्तान के कलाकारों ने हिस्सा लिया था|

चौसठ खम्बा से सटे दो और ढाँचे हैं, जो हमारी धरोहर हैं।  उर्स महल चौसठ खंबा के सामने स्थित, उर्स महल एक असेंबली हॉल (गैलरी में चित्रित) है, जहां ख्वावली के कार्यक्रम त्योहार के दिनों और “सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के उर्स” के दौरान आयोजित किए जाते हैं। यह एक संरक्षित स्मारक है (2003 में इस के कुछ हिस्से को रेनोवेट किया गया था |

मिर्ज़ा ग़ालिब का मकबरा प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्ज़ा ग़ालिब (1797-1869) का एक छोटा मकबरा है, जो मुग़ल काल में उर्दू और फ़ारसी कविता में प्रसिद्ध थे। यह एक संरक्षित स्मारक है। मकबरा कला का बेहद खूबसूरत नमूना हैं ,जिसके सामने वाली दिवार पर मिर्ज़ा ग़ालिब का मशहूर शेर,, न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता ,,बड़ी ही खूबसूरती से लिखा हुआ हैं| जो चौसठ खंबा के बाड़े के उत्तर में स्थित है।काफी सुकून देती हैं ये जगह भीड़भाड़ वाले इलाके मे िस्थित होने के बावजूद पुरसुकून होने का एहसास देती हैं |

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