करोगे याद तो, हर बात याद आयेगी ,गुज़रते वक़्त की, हर मौज ठहर जायेगी खय्याम

फिल्मी

लोगो के दिलो के दर्द को अपने संगीत से दूर करने वाला ,आज खुद ही धोखा खा गया अपने दिल की धड़कनो से ,आज रात 9.30 बजे 19 august 2019 को मुंबई के एक अस्पताल में आईसीयू में जीवन के लिए जूझने के बाद, प्रसिद्ध संगीतकार मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी, ने अंतिम सांस ली। अस्पताल ने उनकी मृत्यु का कारण कार्डियक अरेस्ट घोषित किया। मौत किसी को नहीं चोरटी हैं ले जाती हैं साथ अपने बस रह जाती हैं उस इंसान की यादें और उसके किये हुए काम खय्याम हमेशा हमारे दिलो मे ज़ेहन मे रहेगे एक ताज़ा याद बनकर ,संगीत के लिए घर को छोड़ने वाला खय्याम आज मौत से पीछा नहीं छुड़ा पाया |

खय्याम को फेफड़ों में संक्रमण के कारण भर्ती कराया गया था और वह गंभीर स्थिति में थे । वह थोड़ी देर के लिए वेंटिलेटर पर भी थे ।इस कठिन दौर में संगीतकार और उनकी पत्नी जगजीत कौर की देखभाल कर रहे ग़ज़ल गायक तलत अजीज ने यह खबर साझा की।पंजाब के नवांशहर में जन्मे मोहम्मद जहूर खय्याम ने करियर की शुरुआत 1947 में की थी।

उनके पार्थिव शरीर को घर ले जाया जायेगा और कल उन्हें दफनाने की व्यवस्था की जाएगी । खय्याम चाहते थे कि उनको फोर बंगला कब्रिस्तान में दफनाया जाये । उनकी पत्नी जगजीत कौर भी कुछ समय से अस्वस्थ है।

ख़बरों के अनुसार तलत अज़ीज़ ,अस्पताल में हर दिन उनके लिए कुरान पढ़ते थे । खय्याम साहब की इच्छा थी कि मैं सूरह यासीन पढ़ूँ (उस समय पढ़ूँ जब कोई अपने अंतिम क्षणों के दौरान अपनी अंतिम सांस लेने वाला हो)। मैंने आज ही ऐसा किया था, ”अजीज के अनुसार ,खय्याम क्योंकि वह अपने आंखरी सफर के रास्ते में थे ।90वें जन्मदिन पर खय्याम साहब ने बॉलीवुड को एक अनोखा रिटर्न गिफ्ट दिया था। उन्होंने जीवन भर की कमाई को एक ट्रस्ट के नाम करने का ऐलान किया था। तकरीबन 12 करोड़ रुपए की रकम ट्रस्ट को दी गई। इस पैसे से जरूरतमंद कलाकारों की मदद की जाने लगी। गजल गायक तलत अजीज और उनकी पत्नी बीना को मुख्य ट्रस्टी बनाया गया।

खय्याम का जन्म अविभाजित पंजाब में साआदत हुसैन के रूप में पंजाब के जिला जालंधर के राहों कसबे में हुआ। तब नवांशहर तहसील थी, जो जिला बन गया है। खय्याम के घर मे तालीम को बहुत अहमियत दी जाती थी। देशप्रेम और मेहनत व ईमानदारी से काम करने की सीख दी गई थी। खय्याम संगीत सीखने के लिए दिल्ली भाग आये थे लेकिन उसे अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए वापस जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। खय्याम इसके बाद प्रसिद्ध बाबा चिश्ती से संगीत सीखने के लिए लाहौर गए।

वह कभी भी पढ़ाई में रुचि नहीं रखते थे और हमेशा भारतीय सिनेमा के संगीत पर मोहित थे। वह बहुत छोटी उम्र से ही संगीत के प्रति झुकाव था। वह अक्सर फिल्में देखने के लिए शहर भाग जाते थे । खय्याम जल्द ही अभिनेता बनने की उम्मीद में अपने चाचा के घर दिल्ली भाग गए थे । खय्याम के चाचा ने उन्हें एक स्कूल में दाखिला दिलाया, लेकिन जब उन्होंने फिल्मों के लिए उनका जुनून देखा, तो उन्होंने उन्हें संगीत सीखने की अनुमति दी, जो वास्तव में उनकी महत्वाकांक्षाओं को साकार करने में एक कदम आगे था। उन्होंने पंडित अमर नाथ के अधीन संगीत में अपना प्रशिक्षण प्राप्त किया। वह एक बहुत ही शिक्षित परिवार से ताल्लुक रखते थे।पंजाब के नवांशहर में जन्मे मोहम्मद जहूर खय्याम ने करियर की शुरुआत 1947 में की थी।

खय्याम ने कभी-कभी, उमराव जान, त्रिशूल, नूरी, बाजार, रजिया सुल्तान जैसी फिल्मों के संगीत दिया। ‘इन आंखों की मस्ती के’, ‘बड़ी वफा से निभाई हमने…’, ‘फिर छिड़ी रात बात फूलों की’ जैसे गीत रचने वाले खय्याम ने निजी जिंदगी में कई मुश्किलों का सामना किया। द्वितीय विश्वयुद्ध में वे एक सिपाही के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके थे।

एक अख़बार को दिए  इंटरव्यू में उन्होंने बताया था, की वे केएल सहगल से प्रेरित होकर हीरो बनना चाहते थे । मुंबई आया तो मुझे मेरे गुरु संगीतकार हुस्नलाल-भगतराम ने प्लेबैक सिंगिंग का मौका दे दिया। उस गाने में उनकी को-सिंगर जोहरा जी थीं और कलाम फैज अहमद फैज का था। खय्याम की पहली कमाई 200 रुपए थी। वहां से वे आगे बढ़े और यहां तक पहुंचा। कभी कभी'(1977) और ‘उमराव जान'(1982) के लिए खय्याम ने बेस्ट म्यूजिक का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता था।

खय्याम को केएल सहगल के गाने सुनने और फिल्में देखने का बड़ा शौक था। कस्बे में सिनेमाहॉल नहीं था, इसलिए हफ्ते में जब आधी छुट्टी मिलती तो सब जालंधर में बड़े भाईजान के पास जाते। वहां सब बच्चे मस्ती करते। उन दिनों ट्रेन के सफर में बहुत से नए तजुर्बे हुए। राहों से चार-पांच स्टेशन आगे बढ़ते ही थे कि अब्बाजान अपने ही अंदाज़ में हिंदी-उर्दू-पंजाबी अंदाज़ में कहने लगते – चलो भई, उठो, सलाम करो ते परणाम करो। ये वही गांव है – खटकड़कलां, जहां शहीद भगत सिंह पैदा हुए थे। पूरे हिंदुस्तान की रूह हैं वो, लेकिन हम उनके गांव के करीबी हैं तो हमारे रोएं-रोएं में वो हवा और खुशबू रहती थी।

उन्होंने कविता के क्षेत्र में समकालीन और किंवदंतियों दोनों के साथ काम किया है। यही कारण है कि उनके खाते में मिर्ज़ा ग़ालिब, दाग, वली साहब, अली सरदार जाफ़री, मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, और नए लोगों में शामिल हैं नक़ल लायलपुरी, निदा फ़ाज़ली, जान निसार अख्तर और अहमद वासी के नाम से बना काम हैं ।

खय्याम के संगीत में गज़ल का को चुने की खासियत थी , लेकिन भारतीय शास्त्रीय संगीत में वो निहित था। रचनाएँ भावपूर्ण, मधुर और भावपूर्ण थीं, गीत कविता और उद्देश्य से समृद्ध थे और शैली उन दिनों के लोकप्रिय ब्रांड से अलग थी, जो या तो अर्ध-शास्त्रीय, ग़ज़ल या हल्की रचना हुआ करती थी। खय्याम ने हमेशा ऐसे कवियों के साथ काम करना पसंद किया है जिनकी कविता की मजबूत पृष्ठभूमि नियमित फिल्म गीतकारों को दरकिनार करती है। यही कारण है कि कविता खय्याम की संगीत या गायक के रूप में रचनाओं में एक समान भूमिका निभाती है। खय्याम ने अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए कवियों को पूर्ण स्वतंत्रता देने की कोशिश की जिससे गीतों की अभिव्यक्ति अधिक काव्यात्मक और अधिक सार्थक हुई।

खय्याम के दिए एक इंटरव्यू के अनुसार, वहां से ट्रेन चलती और हम शहादत की कहानियां सुनते रहते। बहरहाल, जालंधर पहुंचने से पहले अब्बा कई बार बता चुकते – वतन के लिए उन्होंने अपने आपको कुर्बान कर दिया। फांसी के तख्ते पर वे हंसते-गाते हुए चढ़े – मेरा रंग दे बसंती चोला! राम प्रसाद बिस्मिल का एक और गीत – `सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है’ वो सुनाते। इतना इंस्पिरेशन मेरी ज़िंदगी के लिए बहुत बड़ा योगदान है। मैं हर काम उसी उसूल के तहत करता रहा हूं कि मादरे वतन (मातृभूमि) की क्या वैल्यू है, हमें कितनी ज़िम्मेदारी से काम लेना है। उन्होंने पुलवामा में भारत की सीमा चौकी पर आतंकवादी हमले के बाद अपना जन्मदिन नहीं मनाने का फैसला किया। वे पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किये जा चुके थे।हमारे दिलो मे ज़ेहन मे रहेगे एक ताज़ा याद बनकर|

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *