ले लो हमारा सब कुछ रख लो अपने पास ,हमे खुली हवा मे सांस लेने दो ,जीने दो हमे |

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परवीन अर्शी नई दिल्ली से
नई दिल्ली ,आज जंतर मंतर पर छात्रों ने एक ‘सार्वजनिक सभा’ ​​का आयोजन किया और आयोजन के लिए पुलिस की अनुमति प्राप्त की थी ।आयोजन उन छात्रों के एक समूह द्वारा आयोजित किया जाता है जो अपने परिवार के साथ घर वापस जाने में असमर्थ होते हैं, और कश्मीर लौटने में असमर्थ होते हैं, ‘जश्न’ वास्तव में भोजन साझा करने के लिए एक सार्वजनिक सभा के रूप मे होता हैं |

जंतर मंतर पर सैकड़ों की तादाद मे लोग जमा हुए थे, लेकिन कोई जश्न नहीं मना रहा था |हर आँख नाम थी उन बच्चो के आंसूओ के साथ जो कश्मीरी बच्चे अपने घरवालों को मिस कर रहे थे |हम कश्मीरी लोग ही नहीं बल्कि घाटी मे कोई कोई भी ईद नहीं मना रहा है .. हम जश्न नहीं मना रहे हैं, बल्कि हमअपनी व्यथा के बारे में बता रहे हैं।

लोग हमारे बारे में नहीं जानते हैं। हम अपने परिवार से बात करना चाहते हैं..हम अकेले हैं। हम परिवार की अनुपस्थिति में त्योहार कैसे मना सकते हैं| क्योकि हम अपने परिवार वालों से बात नहीं कर पा रहे हैं |सारे कनेक्शन बंद कर दिए गए हैं न कोई फ़ोन ,ना इंटरनेट कुछ नहीं हैं |सब के सब सेना के हाथों मे हैं |

हमसे मुजरिमो जैसा व्योवहार क्यों खुली हवा मे सांस भी नहीं ले पाते हैं हम |आखिर क्यों क्या गलती हैं हमारी हमे किसी भी पार्टी पॉलिटिक्स से कोई लेना देना नहीं हैं हमे हमारा परिवार चाहिए घर चाहिए सुकून चाहिए ले लो हमारा सब कुछ रखलो अपने पास| हमे खुली हवा मे सांस लेने दो. जीने दो हमे |

नसीर बताते हैं की श्रीनगर से मेरी ज़िन्दगी जुडी हैं बड़ा वही पर हुआ हूँ, घर हैं मेरा | आज अपने घर की बहुत याद आ रही हैं | माँ का मुझे नमाज के लिए तैयार होने के लिए कहना सुबह सुबह उठाना ..मुझे यह याद आ रहा है.. बकरा ईद पर बहन को ईदी देना, खाना खाना साथ मे ,नमाज़ पढ़ना खुशियाँ मनाना ईद की, सब कुछ खत्म सा लग रहा हैं | हुक्मरानो को कम से कम से कम संचार की सेवाएं खुली रखनी चाहिए था |जबकि कुछ फोन लाइनें खुल गई हैं, और हेल्पलाइन नंबर प्रसारित किए जा रहे हैं, वे पूरे राज्य को कवर करने के लिए बहुत कम हैं। बहुत सारे लोगों के लिए, उनके परिवारों के लिए एक फोन तक पहुंचना और अपने बच्चों को कॉल करना संभव नहीं है। कर्फ्यू और सड़क अवरोध और इन लाइनों के बारे में थोड़ी जानकारी, समस्या की जड़े हैं |

हम हिंदुस्तानी ही हैं, हमसे ऐसा व्यौहार क्यों किया जा रहा हैं |कोई कश्मीरी आपस मे एक दूसरे से भी बात नहीं कर सकता आखिर क्यों | लेकिन मुझे उम्मीद है कि मैं जल्दी ही अपने परिवारवालों के पास चला जाऊंगा|आज कोई हमें फोन नहीं करता है। नाही हमे हमारे अपनों की कोई खबर हैं ,की वो ज़िंदा भी हैं या नहीं बहुत ज़्यादती झेलते हैं हम लोग आखिर क्यों गुनाह क्या हैं हमारा कोई बताये तो सही कब तक सेहते रहेगे ये सब हम और क्यों |

जुबेर जो प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहा हैं जुबेर का कहना हैं की आंसू सुख चुके हैं हमारे .पापा को भी मिस कर रहे हैं हम लोग |माना के ईद यहाँ रहकर भी मनाई जा सकती, लेकिन हालत सही हो तब ना | जब नहीं की हमे अपने माँ बाप के बारे मे कोई ख़ैर खबर ना हो, की वो ज़िंदा भी हैं या नहीं |

लेकिन आज हमे वैसी फीलिंग नहीं आ रही हैं ख़ुशी वाली, डर लग रहा हैं अंदर ही अंदर . दोस्तों के साथ खुद को ही बेवकुफ बना रहे हैं, खुश होने का दिखावा भी नहीं किया जा रहा हैं अब तो |

कविता जो जुबेर ने लिखी
मैं हमेशा के लिए ईद को मिस करूँगा
मैं ईद और फ्रेंड्स को मिस करूँगा
हम बाते नहीं कर सकते हैं किसी से
अपने ही मुल्क मे पराये हो गए हम
ये ईद पर कैसा मातम छाया हैं
हम घरों से दूर हो गए हैं

नहीं कोइ ख़ुशी मिल रही हैं ,कोई मानवता नहीं रही हैं
अशरफुल मख़लूक़ात हैं हम सब
नाटक हो रहा हैं हम सब के साथ
हम तो हिंदीस्तानी थे
प्यार बांटते थे हम

अब वो ये हिन्दुस्तान ना रहा|
बाकी ईदी मेरी,बाकि हैं माँ
बाकि हैं तेरा मेरा मिलना

मैं डरा हुआ हु माँ
मुझे पकवान नहीं चाहिए, बस तुम चाहिए माँ
मेरी माँ से बाते करे दे कोई
वो ज़िंदा हैं या नहीं ,कोई बता यही..

मौके को देखते हुए काफी जाने माने लोग समर्थन मे आगे आये हुए थे |आज हर इंसान कुछ ना कुछ खाने के लिए लेकर आया था अपने साथ | कश्मीरी बच्चो के साथ ईद मानने आखिर बात मोहब्बत की थी, एकता की थी ,हिन्दुस्तान की थी ,ऐसा लग रहा था की मानों वो बच्चे अकेले नहीं हैं सारा हिन्दुस्तान उनके साथ था |

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