महिलाएँ जो बन गईं मिसाल सब के लिए

इंटरनेशनल वूमेन डे यानी महिला शक्ति का दिन, महिलाओ के सम्मान का दिन। वो महिलाएं जो छाप छोड़ देती हैं, समाज के लिए उद्हारण बन जाती हैं। उनके होसलें  और हिम्मत सब के प्रेरणा बन जाते हैं।

धागा ही समझ तू अपनी मन्नत का मुझे,
तेरी दुआओं के मुकम्मल होने का दस्तूर हूँ मैं।

परवीन अर्शी अरमान

 

परवीन अर्शी  ऐसी पत्रकार है जिसने परेशानियों को हथियार बनाकर ज़िन्दगी की जंग जीतकर दिखाई है…

परवीन अर्शी ने ज़िन्दगी को होसलों से बदल कर दिखाया, मप्र के छोटे से गाँव मे जन्मी अर्शी का दिल्ली तक का सफर आसान नहीं था। कई रुकावटों को पार कर मंजिल तक पहुंची है। वे उनके परिवार की पहली पत्रकार है और  अपने राज्य, गाँव और मुस्लिम समाज की पहली महिला पत्रकार हैं, जिसे इंडियन आइडियल नेशनल वूमनिया अवार्ड मिला हैं राजस्थान मे |पर्दा सिस्टम को तोड़ कर पत्रकारिता मे कदम जमाना आसान नहीं था। गृहणी होकर भी कलम और शब्दों का साथ कभी नहीं छोड़ा।

अपने शब्दों को सिर्फ आवाज़ देना बाकि था |अपने हुनर और शब्दों के ताने बाने  को बखूबी कर दिखाया और दिल्ली आकर टीवी पत्रकारिता से दुबारा करियर की शुरुआत की | टीवी पत्रकारिता से करियर की शुरुआत करने वाली परवीन अर्शी, एक किडनी गवा ने के बाद भी उन्होने अपने हिम्मत और हौसले मे कमी नहीं आने दी हैं।

उनके पति भी न्यूज़ एडिटर हैं। लेकिन उन्होने अपनी जगह खुद बनाई हैं  | पत्रकारीयता में बिना किसी गॉड फादर के, दुनिया मे काबिलियत का नया मुकाम खड़ा करना था, तो बस आत्मविश्वास से भरपुर और अटल साहस से ठान लिया कि सामने आकर दुनिया को खुद का काम और हुनर दिखाना हैं और लोगों को सिखाना भी था कि महिलाएं चाहे तो ,क्या कुछ नहीं कर सकती हैं।

बचपन से उन्हे रंगो से खेलने का शौक था उन्हें ,अपने इस शौक को उन्होने कभी मरने नहीं दिया आज भी वो पेंटिंग्स करती हैं |दरसल उन्हें पेंटिंग करने का बेहद शौक हैं| पेंटिंग का शौक रखने वाली परवीन अर्शी आज भी रंगो को मतलब देती हैं। शायरी का कोई शौक तो नहीं था |पर  उन्हे पर जब कलम थामा तो शब्दों को अलग ही माला मे पिरो दिया | बिना मीटर के शायरी करने से इन्हे कोई परहेज़ नहीं हैं , इनका कहना हैं की शब्दों को किसी मीटर मे ना बाँधा जाये भावनाएँ हैं हमारी, इन्हे अल्फाज़ो मे बस पिरोया जाये।

अब शगुफ्ता टाइम्स की एडिटर हैं। कलम आज भी हाथों मे है।आए दिन कई लेख प्रकाशित होते रहते हैं। वॉइस ओवर आर्टिस्ट भी हैं, कई डॉक्यूमेंटरीज मे अवाज़ दे चुकी हैं।  खुद भी बनाती हैं। जाने माने फ्रीडम फइटर्स, फ़िल्मी हस्तियां और कई हाई प्रोफाइल हस्तियों के इंटरव्यू ले चुकीं हैं। परवीन अर्शी को कई अवार्ड्स से सम्मानित किया जा चूका हैं।

 

डॉ अनीता भारद्वाज भारत की पहली महिला हैं, जिन्होंने अपनी पहल से ” फ्री हाई एलीटूड मेडिकल सर्विसेज” की शुरुआत की

डॉ अनीता भारद्वाज भारत की पहली महिला हैं, जिन्होंने अपनी पहल से ” फ्री हाई एलीटूड मेडिकल सर्विसेज़ सर्विसेज” की शुरुआत की है और महिलाओं के लिए एक उल्लेखनीय काम किया है और 5600 से अधिक पीड़ितों को बचाया है जो उच्च ऊंचाई वाली आपदाओं में फंस गए थे। वह साहस और देशभक्ति की उत्कृष्ट कहानियों की रोल मॉडल हैं।

उन्हें 4 राष्ट्रीय पुरस्कार मिले ,नारी शक्ति पुरस्कार 2018 राष्ट्रपति द्वारा यदि भारत, राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार 2017 – भारत सरकार, कल्पना चावला शौर्य पुरस्कार 2016 हरियाणा सरकार द्वारा, दिल्ली सरकार द्वारा महिला उपलब्धि पुरस्कार।

वह एनी हाईट – एनीव्हाइट – एनीटाइम- एनी वियर और एनी हिल में लोगों के जीवन और मृत्यु के सवाल से निपट रही है। डॉ। अनीता, सिक्स सिग्मा हेल्थकेयर उच्च ऊंचाई पर सभी जरूरतमंद लोगों को मुफ्त उच्च एल्टीट्यूड मेडिकल सेवा प्रदान कर रही है। वह 5600 से अधिक पीड़ितों को बचाने वाले हाई एल्टीट्यूड मेडिकल रेस्क्यू के रियल लाइफ हीरोज हैं। इसने बहुत से लोगों को उच्च ऊंचाई की अधिकांश कठिन परिस्थितियों में समाज की सेवा के लिए प्रेरित किया है।

उन्होंने समाज के नेतृत्व का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया, चिकित्सा प्रबंधन ने देश के लिए काम और निस्वार्थ सेवाओं को प्रतिष्ठित किया, वह एकमात्र महिला हैं जो किसी भी समय, कहीं भी, चाहे वह किसी भी वर्ग, पंथ, धर्म, क्षेत्र, में मुफ्त उच्च ऊंचाई वाली चिकित्सा सेवाएं प्रदान कर रही हों, राज्य या देश। माननीय प्रधान मंत्री श्री द्वारा इस कार्य की सराहना  की गई हैं ।

डॉ, अनीता भारद्वाज निशुल्क उच्च ऊंचाई वाली चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने के लिए स्वयंसेवकों के रूप में अधिक से अधिक महिलाओं को जोड़ना चाहती हैं। वह पर्वतीय दवाओं का एक संस्थान भी स्थापित करना चाहती हैं।

 

शबनम हाशमी आज भी उम्मीद हैं उन महिलाओ की , जहां  इस पुरुष प्रधान देश में महिलाएँ अपनी उम्मीद छोड़ देती हैं|

शबनम हाशमी का जन्म 1957 में अलीगढ़ में हुआ, दिल्ली से लगभग 80 मील दूर एक छोटा शहर मे |वह पांच बच्चों में सबसे छोटी थी। हालाँकि उनका परिवार दिल्ली का था, लेकिन विभाजन ने उनके दादा के व्यवसाय को बर्बाद कर दिया। शबनम ने जब स्कूल खत्म किया, तब तक उसने ज्यादातर सोवियत, रूसी और अंग्रेजी शास्त्रीय साहित्य पढ़ा था। पहली पुस्तक जिसने उस पर गहरी छाप छोड़ी थी, जब वह 13 साल की थी, ऐनी फ्रैंक की डायरी थी।

1976 में, उनके पिता की 54 साल की उम्र में कैंसर से मृत्यु हो गई, और परिवार आर्थिक संकट की खाई में गिर गया। अपने अधिकांश भाई-बहनों के साथ अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, शबनम ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए विभिन्न छात्रवृत्ति के लिए आवेदन किया।वह छह साल के लिए एक सांस्कृतिक विनिमय छात्रवृत्ति पर (पूर्व) यूएसएसआर चली गई। 1981 में, जब वह अपने विश्वविद्यालय से छुट्टी के दौरान भारत आई थी, तो वह एक मुस्लिम बस्ती में युवा मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं को पढ़ाने में इतनी गहराई से शामिल हो गई कि उसने अपना कोर्स पूरा करने के लिए वापस नहीं जाने का फैसला किया।

1985 में शबनम ने एक युवा इंजीनियर गौहर रज़ा से शादी हुई, शबनम का एक बेटा, साहिर, एक बेटी सेहर हैं | वह आपदा प्रबंधन, महिलाओं की साक्षरता, पर्यावरण संबंधी मुद्दों, बच्चों की शिक्षा, महिलाओं के खिलाफ हिंसा, गोद लेने, दलितों के अधिकारों और वैज्ञानिक स्वभाव के विकास जैसी अन्य चिंताओं से भी सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं।

भारत में सांप्रदायिकता का मुकाबला करने के लिए 20 से अधिक वर्षों तक काम किया है। वह अपने एक्टिविस्ट भाई सफ़दर हाश्मी की याद में कलाकारों और बुद्धिजीवियों द्वारा बनाई गई ‘सहमत’ के निर्माण और संचालन से जुड़ी थीं, जिनकी 1989 में नुक्कड़ नाटक करते समय हत्या कर दी गई थी। एनजीओ एक्ट नाउ फॉर हार्मनी एंड डेमोक्रेसी (अनहद) की स्थापना मार्च 2003 में हुआ था। स्वेच्छा से और बिना फीस के और सीमित धन के साथ काम करना, शबनम ने कर दिखाया ओर अनहद एक समूह के रूप में उभरा है।

‘अनहद’ का मुख्य उद्देश्य, जिसे “दिमाग की इस लड़ाई को खत्म करने के लिए” स्थापित किया गया था, पूरे देश में एक धर्मनिरपेक्ष कैडर तैयार करना था और सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं, छात्रों और युवाओं का मुकाबला करना था। नफरत की विचारधारा। उसने अनहद की कल्पना एक खुले मंच के रूप में की, जहाँ शांति और सद्भाव के लिए काम करने वाले एक साथ आ सकते थे

राजनीति के सांप्रदायिकरण की शबनम की लगातार और सख्त आलोचना ने उसके कई दुश्मनों को जीत लिया, इस हद तक कि उस पर कई बार शारीरिक हमला किया गया 11 और 17 अप्रैल, 2004 को। 2004 में आम चुनावों से पहले, शबनम ने 40 छात्रों के साथ, लगभग 9,500 मील और 40 शहरों को कवर करते हुए सड़क मार्ग से पूरे भारत की यात्रा की। हर शहर में, छात्रों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया और युवा मतदाता से सांप्रदायिक ताकतों को हराने की अपील की।

शबनम हाशमी भारत की उन नब्बे महिलाओं में से थीं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार -2005 के लिए विश्व स्तर पर नामांकित 1000 महिलाओं की सूची में शामिल किया गया था।हाशमी ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी, गोद लेने, लैंगिक न्याय, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है।उन्हें एशिया में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए एसोसिएशन (ACHA) 2005 में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए स्टार अवार्ड, 2005 में आमिल स्मृति सम्मान और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग द्वारा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार पुरस्कार 2008 से सम्मानित किया गया था।आज भी शबनम हाशमी अपना काम बखूबी कर रही हैं उसी रफ़्तार से जैसे पहले करती थी | शबनम आज भी उम्मीद हैं उन महिलाओ की , जहा इस पुरुष प्रधान देश मे महिलाये अपनी उम्मीद छोड़ देती हैं|

 

निर्मला भुराड़िया पिछले बीस वर्षो से पत्रकारिता को समर्पित किया जीवन

निर्मला भुराड़िया पिछले बीस  वर्षो से इंदौर मे पत्रकारिता को समर्पित अपने लेख आलेख रिपोर्ट्स और  पूर्व नई दुनिया इंदौर की मैगज़ीन नायिका की असली नायिका निर्मला भुराड़िया ही रही हैं | निर्मला जी ने दूरदर्शन की एक शार्ट फिल्म मे अभिनय भी किया हैं |दूरदर्शन के लिए एक लेखिका पर डाक्यूमेंट्री के लिए लेखन के काम भी संभाला ,आज तक न्यूज़ चैनल के लिए फ्रीलांसिंग भी की ,इंटरनेशनल नेवसपोर्टल नेवसगब की सलाहकार टीम की मेंबर रह चुकी हैं |

घास के बीज ,एक ही कैनवास पर बार बार ,कमरे के पीछे महिलाये ,विश्व सुंदरी ,ऑब्जेक्शन माय लार्ड गुलाम मंडी थर्ड सेक्स पर आधारित उपन्यास काफी चर्चित रहा ,बेहद सरल स्वाभाव ,चेहरे पर तेज और हर विषय को समझने बुझने की काबिलियत उन्हे सबसे अलग बना देती हैं|

अपनी सारी ज़िन्दगी पत्रकारिता को समर्पित कर इन्होने साबित किया हैं की पत्रकारीयता जीवनयापन का काम ही नहीं बल्कि एक सेवा समाज के लिए ,सच के लिए ,न्याय के लिए |अपने पत्रकारिता जीवन मे के बार विदेश यात्रा भी करी वह की सभ्यता वहाँ के रहन सहन और वह की कई चीज़ो से रूबरू करवाया हैं लोगो को अपने लेखो द्वारा |

निर्मला भुराड़िया को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चूका हैं अपने कार्यो के लिए, अगर निर्मला भुराड़िया को इंदौर की शान कहा जाये तो कम न होगा, बल्कि इंदौर की शान मे चार चाँद जैसा लगेगा |

             शबनम खान (ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट) के खून मे ही देश भक्ति हैं

शबनम खान ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट हैं शबनम के खून मे ही देश भक्ति हैं | तभी तो बात देश की हो या न्याय की हमेशा ही लोगो को न्याय दिलवाने के लिए आगे आती हैं शबनम | शबनम खान जी कइ पिता मोहद फ़ज़ीलत खान जी 62 और 65 की वॉर लड़े हुए एक आर्मी अफसर हैं | परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद के साथी थे |

शबनम खान जी ने न सिर्फ दिल्ली बल्कि पुरे देश के लोगों के लिए काम करती हैं | दामिनी ,गुड़िया और जिन केसेस को कोई सुनवाई नहीं हुई थी उनके लिए देश के अलग अलग हिस्सों में जाकर उनपर काम किया , लोगों को उनके अधिकार के प्रति जागरूक कर रही हैं | अभी तीन तलाक़ बंद कराने में उन्होंने अहम् भूमिका निभाई और इस्लाम को गलत तरह से बताने वाले मौलानाओं को करारा जवाब दिया |

शबनम खान ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट जो पिछले 15 सालों से जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं शबनम खान एक ज़बरदस्त मज़बूत इच्छा शक्ति रखने वाली लड़की जो बिना डरे निर्भीकता से जनता के हक़ के लिए| शासन प्रशासन से लड़ कर जनता को इन्साफ दिलाती हैं | बल्कि विभिन्न राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल्स में भी जनता की आवाज़ बुलंद करती हैं |पूरे देश में गाँव गाँव महिलायें पढ़ें इसपर काम कर रही हैं क्यूंकि शिक्षा ही महिलाओं को सशक्त करती है , और आर्थिक रूप सी सम्पन्न करना सरकार की ज़िम्मेदारी हैं |और सरकार को इसपर काम करना बेहद ज़रूरी है |

 

 

 

 

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