सोने के वर्क वाले बीस हज़ार पान से स्वागत किया जाता था अतिथियों का, होल्कर की होली मे

राजवाड़े में खेली जाने वाली होली बहुत प्रसिद्ध रही है ,जिसमें निमंत्रण पाने के लिये बड़े – बड़े लोग तरसते थे।  राजा मल्हारराव होलकर ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने मैसूर से १७ टन चंदन की लकड़ी मंगवा कर उसकी होली जलाई थी| लगभग पौने तीन सौ साल पहले इंदौर शहर में होलकरों ने होलिका दहन की पंरपरा शुरू की थी। राजबाड़ा के सामने विधि- विधान के साथ इसका दहन किया जाता था।  उसके बाद यहां से अग्नि लेकर शहरवासी अपने-अपने इलाकों में होली जलाते थे।

यहाँ होली दहन के पहले देते थे , पांच तोपों से सलामी ,२१ राउंड फायर की परंपरा थी | दरबार मे आये हुए अथितियो  पर पुष्प वर्षा की जाती थी और होली के एक  दिन  पहले रात को जश्न  मनाया जाता था | फिर चाँदी के थाल मे रंग सजाया जाता था | होली के जलने  तक  कोई  नहीं  सोता  था,  उस वक़्त ख़ुशी  मानने के लिए हास्य के कलाकार भांड  को बुलाया जाता था हास्य  रंग  के लिए |

निरत्यांगनाओ  का नृत्य  प्रस्तुत किया जाता था |रजवाड़े पर होली का दहन के पश्चात  पूजन के लिए राजघराने के सदस्य शाही लिबास मे पहुंचते  थे पूजन के लिए | पूजन के बाद बलि की परंपरा भी थी |होल्कर परिवार मे 20 सेर केवड़ा, 20 सेर गुलाब जल, हज़ारो  किलो  गुलाब के फूल 60 सेर गुलाल ,खरीदने का रिवाज था | सोने के वर्क वाले बीस हज़ार पान से स्वागत किया जाता था अतिथियों का | राजबाड़ा सहित सारी छतरियों को इत्र से महकाया जाता था |

होल्कर रियासत में कई उत्सवों और त्योहारों और खास मौकों पर राजा की सवारी निकाला करती थी।कई बार इन मौकों पर सेंट्रल इंडिया की रियासतों के राजा-महाराजाओं को भी आमंत्रित किया जाता था।  इसमें महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय अपनी आन-बान-शान के साथ बैठते थे । वे जिस हाथी पर बैठते थे , वह स्टेट एलिफेंट कहलाता था। इस एलिफेंट को खूबसूरती के साथ सजाया जाता था।

एक किस्सा बया किया जाता हैं की, राज परिवार में एक अप्रतिम सुन्दरी केसर कली थी|जो राजवाड़े की ऊपर मंजिल के किसी झरोखे से नीचे हो रहा होली का हुड़दंग देख रही थीं। उन पर उड़ती सी एक नज़र सिंधिया के खासगी सरदार काशीराव ने डाली और रात होते होते होलिका की अग्नि में उस काशीराव की खोपड़ी भी स्वाहा कर दी गई थीं ।

एक अन्य अवसर पर इंदौर स्थित ब्रिटिश रेज़िडेंट हेनरी डेली अपनी मेमसाहिबा वेरोनिका को होली का मज़ा दिलाने के लिये इस राजवाड़े में होली के दिन पधारे थे |जहां शीश महल में रहने वाली रानियों – पटरानियों ने उनके साथ जम कर होली खेली थीं ।  पश्चिमी शीशमहल में केसर मिश्रित भांग खाकर वेरोनिका दो दिन तक बेहोश पड़ी रहीं।

सदियों से चली आ रही परंपराओं को नई परिभाषा देने के लिए होलकर और रावला परिवार फिर आगे आए करीब दो वर्ष पहले ।सरकारी होली में लगभग ढाई क्विंटल लकड़ियों का उपयोग होता था। समय के साथ  लकड़ियों का उपयोग कम कर दिया था लेकिन पिछले  दो वर्षो से साल से सरकारी होली गाय के गोबर के कंडों से जलाने का संकल्प लिया गया था ।

दो वर्षो से 1100 से ज्यादा कंडों का इंतजाम किया जा रहा है। ख़बरों के अनुसार इन सभी इंतजामों में जुटे अहिल्या चैरिटेबल ट्रस्ट का मानना है की पर्यावरण और पशुधन संरक्षण के लिए यह अच्छी पहल है इसलिए होलकर परिवार से जुड़े सभी लोगों से इसकी अनुमति मिल गई थी ।सरकारी होली में लगभग ढाई क्विंटल लकड़ियों का उपयोग होता था।

 

 

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