‘तुम बिल्कुल हम जैसी निकली’ फहमीदा रियाज़

बेहद बेबाकी से अपनी बात को कहने का अंदाज़ और खुश रहना और ज़िन्दगी के हर लम्हे को जीना कोई फहमीदा रियाज़ से सीखे ,अपने इंटरव्यू के दौरान के कुछ यादे साँझा की ख़ास तौर से हिन्दुस्तान की खुली आज़ाद फ़िज़ा जहा पर आज़ादी महसूस होती थी उन्हे , काफी करीब पाती थी खुद को ,इस सर ज़मीन के क्यों न हो आखिर पैदाइश भी यही हुई थी|और कुछ बरस भी हिंदुस्तान मे बिताये थे |आज अंत हुआ एक ऐसी शख्सियत का, जिसने होसला कभी नहीं हारी डटी रही हमेशा अपने ज़िन्दगी के सफर मे|

फहमिदा रियाज का जन्म 28 जुलाई 1 9 45 को ब्रिटिश भारत के मेरठ, यूपी के एक साहित्यिक परिवार में हुआ था। उनके पिता, रियाज-उद-दीन अहमद एक शिक्षाविद थे, जो सिंध प्रांत के लिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली का मानचित्रण और विकास करने में शामिल थे।सिंध प्रांत में उनके पिता के स्थानांतरण के बाद उनका परिवार हैदराबाद शहर में बस गया।

जब वह चार वर्ष की थी तब उसके पिता का निधन हो गया और इसलिए उसे अपनी मां ने लाया। उसने अपने बचपन में उर्दू और सिंधी साहित्य के बारे में सीखा और उसके बाद फारसी भाषा सीखी। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के लिए न्यूज़कास्टर के रूप में काम करना शुरू किया।

फहमिदा रियाज को कॉलेज से स्नातक होने के बाद अपने परिवार द्वारा एक व्यवस्थित विवाह के लिए कहा गया था। पाकिस्तान वापस आने से पहले उन्होने अपने पहले पति के साथ यूनाइटेड किंगडम में कुछ साल बिताए। फिर तलाक़ हो गया ,इस विवाह से उसकी 1 बेटी है। इस अवधि के दौरान उन्होंने बीबीसी उर्दू सेवा (रेडियो) के साथ काम किया और फिल्म बनाने में डिग्री हासिल की।

 

 

राजनीतिक कार्यकर्ता जफर अली उजन के साथ उनकी दूसरी शादी हुई जिनसे से उनके दो बच्चे हैं फहमिदा रियाज ने अपना खुद का उर्दू प्रकाशन अवाज शुरू करने से पहले कराची शहर में एक विज्ञापन एजेंसी में काम किया था।

उर्दू की प्रमुख शायरा एवं लेखिका रही हैं। फहमिदा रियाज एक प्रगतिशील उर्दू लेखक, कवि, मानवाधिकार कार्यकर्ता और पाकिस्तान की नारीवादी थी । बाद में इनका परिवार पाकिस्तान जाकर बस गया। वह गोदावरी, खट्ट-ए मार्मूज, और खाना ई आब ओ गिल के लेखक हैं, जो फारसी से जलालुद्दीन रुमी के मस्नवी का पहला अनुवाद फारसी में उर्दू में हैं| गोदावरी, ख़त-ए-मरमुज़ इनके प्रमुख संग्रह हैं।

फहमिदा रियाज आधुनिक और समकालीन उर्दू के बेहतरीन कवियों में से एक माना जाता है। वह एक क्रांति के बाद पाकिस्तानी समाज की कल्पना करती है जो मनुष्य को आर्थिक, मानसिक और नैतिक इंद्रियों में मनुष्यों के उत्पीड़न से मुक्त करती है|कथा और कविता पर 15 से अधिक किताबों के लेखक वह हमेशा विवादों के केंद्र में बानी रही ।

जब कविता का उनका दूसरा संग्रह, बदन दरेदा आया , तो उनकी कविता में कामुक और कामुक अभिव्यक्तियों का उपयोग करने का आरोप लगाया गया। तब तक उनकी कविता में प्रचलित विषयों को महिलाओं के लेखकों के लिए वर्जित माना जाता था। उन्होंने सिंधी से उर्दू तक शाह अब्दुल लतीफ भितई और शेख आइज के कार्यों का भी अनुवाद किया है।

1980 के दौर में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक के शासन में उनको और उनके पति को निर्वासन के बाद भारत में शरण लेनी पड़ी थी|और यहाँ सात साल बिताए। इस समय के दौरान रियाज दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में कवि थी और यह उनके निर्वासन के दौरान ही उन्होंने हिंदी पढ़ना सीखा। निर्वासन से लौटने पर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया। उनके संग्रहअपना जुर्म सबित हो की कविताओं ने जनरल ज़िया-उल-हक की तानाशाही के तहत अपने मातृभूमि के अनुभव को प्रतिबिंबित किया|

फहमिदा रियाज ने 28 जुलाई को पाकिस्तान में प्रवास करने से पहले , भारत में हैदराबाद मे अपने बचपन का हिस्सा बिताया था। उनकी पहली किताब जब वह बीस वर्ष की थी तब प्रकाशित हुई थीं। पठार की जुबान शीर्षक से, उन्होंने उसे उर्दू कविता में माना जाने वाला एक आवाज के रूप में लॉन्च किया था ।

उनकी दूसरी किताब बदन दरेदा (द बॉडी, एक्सपोज़ड) ने रूढ़िवादी से चिल्लाया, लेकिन उर्दू कविता के लिए पूरी तरह से नया मुहावरे प्रदान किया। यह उनके स्पष्ट राजनीतिक विचार थे जिसने उन्हें निर्वासन में जाने के लिए मजबूर किया। वह कुछ समय के लिए भारत में रही थी, लेकिन बाद में पाकिस्तान लौट गई ।

रियाज की कविता नारीवाद द्वारा सूचित राष्ट्रीय, राजनीतिक और वैचारिक विषयों के साथ काम करती है।अपने इंटरव्यू के दौरान के बार अपने हिंदुस्तान की जुडी यादों मे कही खो जाती थी |हिंदुस्तान की फ़िज़ा को बहुत पसंद करती थी खुली हवा मे सास लेना कितना अच्छा लगता हैं बकौल फहमीदा रिआज़ की उनकी आँखों मे नज़र आ रहा था |

हालाकि उन्हे अपने मुल्क से उतना ही प्यार था जितना हिन्दुस्तान से था| बटवारा उन्हे भी पसंद नहीं था सब एक ही हैं खुदा के बंदे फर्क कैसा यहाँ का खाना मिटटी की खुशबु अपना पुराना शहर सब कुछ पसंद था उन्हे |औरतो की हालत को लेकर काफी बेबाकीसे कहना उन्हे पसंद था |

फ़हमीदा रियाज़ जैसी शायरा ज़िया-उल-हक शासन के हालातो से बेचैन हो कर एक नज्‍म लिखती हैं लेकिन उनका लिखा यहाँ के ‘राष्‍ट्रवादी तत्‍वों’ को पसंद नहीं आता है। भारत में बढ़ते असहिष्णुता के बारे में चिंताओं की पृष्ठभूमि में उन्होंने 8 मार्च 2014 को भारत में बढ़ते हिंदुत्व की तुलना में पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरतावाद के उदय की तुलना में ‘हम गुनाहगर औरते’ नामक एक सेमिनार में अपनी कविता ‘तुम बिल्कुल हम जैसी निकली’ का जिक्र किया। 21 वीं नवम्बर 2018 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया ।परवीन अर्शी (को दिए गए इंटरव्यू के कुछअंश)

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